
रायगढ़। संगीत, नृत्य, लोककला और भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के लिए विशेष पहचान रखने वाले रायगढ़ के 41वें चक्रधर समारोह का शुभारंभ भगवान श्री गणेश की पूजा-अर्चना और दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। राज्यपाल श्री रमेन डेका ने समारोह के शुभारंभ अवसर पर भगवान गणेश का विधिवत पूजन-अर्चन किया और दीप प्रज्ज्वलित कर सांस्कृतिक आयोजन का औपचारिक शुभारंभ किया। जिला रायगढ़ की आधिकारिक वेबसाइट पर वर्ष 2026 के चक्रधर समारोह की जानकारी उपलब्ध है और समारोह के प्रथम दिन 14 सितंबर को शुभारंभ समारोह में गणेश वंदना का उल्लेख किया गया है। चक्रधर समारोह रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा प्रमुख आयोजन है, जिसमें शास्त्रीय संगीत, नृत्य, लोककला और देश की विविध सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़े कलाकार अपनी प्रस्तुतियां देते हैं। इस वर्ष भी समारोह में अलग-अलग विधाओं के कलाकारों की प्रस्तुतियों को स्थान दिया गया है। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार प्रथम दिन गणेश वंदना के साथ पंडवानी और लोक कला एवं संगीत की प्रस्तुतियां निर्धारित थीं। गणेश वंदना श्री वेदमणि सिंह ठाकुर के शिष्यों द्वारा प्रस्तुत की गई, जबकि पंडवानी की प्रस्तुति पद्मश्री सम्मानित डॉ. उषा बारले और लोक कला एवं संगीत की प्रस्तुति पद्मश्री सम्मानित श्री अनुज शर्मा द्वारा की गई। भगवान गणेश की पूजा-अर्चना के साथ समारोह का शुभारंभ भारतीय परंपरा में किसी भी शुभ कार्य को मंगलाचरण और प्रथम पूज्य भगवान गणेश के स्मरण के साथ प्रारंभ करने की सांस्कृतिक भावना को भी दर्शाता है। दीप प्रज्ज्वलन के बाद सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का क्रम आगे बढ़ा और समारोह का वातावरण कला एवं संस्कृति की रंगत से भर उठा। चक्रधर समारोह का नाम रायगढ़ के कला-संस्कृति इतिहास से जुड़े महाराज चक्रधर सिंह की स्मृति से जुड़ा हुआ है। रायगढ़ में आयोजित यह समारोह कलाकारों, कला प्रेमियों और सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि रखने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण मंच के रूप में सामने आता है। समारोह के माध्यम से विभिन्न भारतीय नृत्य शैलियों, संगीत परंपराओं और लोककलाओं को एक मंच पर प्रस्तुत करने का अवसर मिलता है। इस आयोजन की विशेषता यह है कि यहां स्थानीय प्रतिभाओं के साथ देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आने वाले कलाकार भी अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। आधिकारिक कार्यक्रम में 14 से 20 सितंबर तक विभिन्न प्रस्तुतियों का क्रम दर्ज है, जिसमें कथक, राजस्थानी फोक, कुचिपुड़ी, तबला वादन, पंडवानी, भजन गायन, छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य, भरतनाट्यम, ओडिसी, मणिपुरी, कबीर भजन, लोक संगीत, गोटीपुआ और अन्य प्रस्तुतियां शामिल हैं। इस प्रकार समारोह का शुभारंभ केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम की शुरुआत नहीं, बल्कि भारतीय कला और सांस्कृतिक विरासत को मंच प्रदान करने वाले आयोजन की औपचारिक शुरुआत के रूप में हुआ।
41वें चक्रधर समारोह की कार्यक्रम संरचना में भारतीय शास्त्रीय एवं लोक कलाओं की विविधता को स्थान दिया गया है। आधिकारिक कार्यक्रम के अनुसार समारोह के दूसरे दिन 15 सितंबर को रायपुर की सुश्री अनुष्का सुल्तानिया द्वारा कथक, राजस्थान के बाड़मेर की स्टॉर्क सोसायटी द्वारा राजस्थानी फोक, दिल्ली के टी. लक्ष्मी रेड्डी द्वारा कुचिपुड़ी, दिल्ली के श्री निशित गंगानी द्वारा तबला वादन, रायपुर की तरुणा साहू एंड ग्रुप द्वारा पंडवानी और वृंदावन के माधवरस बैंड द्वारा भजन गायन की प्रस्तुतियां निर्धारित थीं। तीसरे दिन 16 सितंबर को छत्तीसगढ़ी लोक नृत्य, कथक, भरतनाट्यम और लोक कला की प्रस्तुतियों का कार्यक्रम रखा गया। चौथे दिन 17 सितंबर को कथक, ओडिसी और भरतनाट्यम सहित विभिन्न प्रस्तुतियां निर्धारित थीं। पांचवें दिन 18 सितंबर को कुचिपुड़ी, मणिपुरी, कबीर भजन और लोक संगीत की प्रस्तुतियां हुईं या निर्धारित कार्यक्रम का हिस्सा रहीं। छठे दिन 19 सितंबर को ओडिसी और काव्य संध्या का आयोजन रखा गया, जबकि सातवें दिन 20 सितंबर को गोटीपुआ और खैरागढ़ संगीत विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों की नृत्य प्रस्तुति का कार्यक्रम दर्ज है। इन प्रस्तुतियों के माध्यम से चक्रधर समारोह में भारत की विविध नृत्य और संगीत परंपराओं को एक मंच पर देखने और सुनने का अवसर मिलता है। कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, ओडिसी और मणिपुरी जैसी शास्त्रीय नृत्य शैलियां अपनी अलग-अलग तकनीक, भाव-भंगिमा, ताल और प्रस्तुति शैली के लिए जानी जाती हैं, जबकि पंडवानी, लोक नृत्य, लोक संगीत और कबीर भजन जैसी विधाएं भारतीय लोक एवं जनसांस्कृतिक परंपराओं को अभिव्यक्त करती हैं। चक्रधर समारोह की यही विविधता इसे सांस्कृतिक दृष्टि से व्यापक आयोजन का स्वरूप प्रदान करती है। रायगढ़ की कला परंपरा और समारोह की पहचान को देखते हुए देश के विभिन्न क्षेत्रों के कलाकारों की सहभागिता स्थानीय दर्शकों के लिए भी सांस्कृतिक अनुभव का अवसर बनती है। समारोह के माध्यम से युवा पीढ़ी को भारतीय कला की विभिन्न विधाओं को करीब से देखने और समझने का अवसर मिलता है। सांस्कृतिक आयोजनों की निरंतरता किसी क्षेत्र की कला विरासत को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। कलाकारों को मंच मिलने से उनकी साधना और कला को दर्शकों तक पहुंचाने का अवसर मिलता है, वहीं दर्शकों को विभिन्न कला विधाओं से परिचित होने का अवसर प्राप्त होता है। 41वें चक्रधर समारोह की आधिकारिक कार्यक्रम सूची में स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान रखने वाले कलाकारों को शामिल किया गया है, जिससे आयोजन की प्रस्तुति विविध और बहुआयामी दिखाई देती है। राज्यपाल श्री रमेन डेका द्वारा भगवान गणेश की पूजा-अर्चना और दीप प्रज्ज्वलन के साथ समारोह की शुरुआत इस पूरे सांस्कृतिक आयोजन को पारंपरिक शुभारंभ प्रदान करती है। भारतीय संस्कृति में दीप प्रज्ज्वलन को ज्ञान, प्रकाश और सकारात्मकता के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, जबकि भगवान गणेश का स्मरण शुभ कार्यों की शुरुआत से जुड़ी धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। इस प्रकार उद्घाटन की प्रक्रिया में धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक आयोजन का समन्वय दिखाई देता है।
चक्रधर समारोह की विशेषता उसकी बहुविध सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ-साथ रायगढ़ की ऐतिहासिक कला चेतना से जुड़ाव में भी दिखाई देती है। जिला प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी में समारोह के कार्यक्रम और कलाकारों का विस्तृत विवरण दर्ज किया गया है, जिससे आयोजन की व्यापक सांस्कृतिक संरचना सामने आती है। इस आयोजन के माध्यम से देश के विभिन्न हिस्सों से कलाकार रायगढ़ पहुंचते हैं और अपनी-अपनी कला विधाओं को दर्शकों के सामने प्रस्तुत करते हैं। किसी भी सांस्कृतिक समारोह के लिए यह प्रक्रिया कला के आदान-प्रदान का महत्वपूर्ण माध्यम होती है। एक ही मंच पर अलग-अलग प्रदेशों की नृत्य, संगीत और लोककला परंपराओं का प्रस्तुत होना दर्शकों को भारत की सांस्कृतिक विविधता से परिचित कराता है। चक्रधर समारोह में छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं के साथ-साथ देश के अन्य हिस्सों की शास्त्रीय और लोक कलाओं को भी स्थान दिया गया है। आधिकारिक कार्यक्रम में रायगढ़, रायपुर, दुर्ग-भिलाई, बिलासपुर, बस्तर, खैरागढ़, दिल्ली, भुवनेश्वर, बेंगलुरु, चेन्नई, मणिपुर, राजस्थान और अन्य स्थानों से जुड़े कलाकारों एवं समूहों की प्रस्तुतियों का उल्लेख है। इससे यह स्पष्ट होता है कि समारोह की संरचना स्थानीय और राष्ट्रीय सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों को एक साथ मंच देने पर आधारित है। ऐसे आयोजन कलाकारों के बीच संवाद और दर्शकों के बीच सांस्कृतिक समझ को बढ़ाने का माध्यम भी बन सकते हैं। शास्त्रीय कलाओं की प्रस्तुति में वर्षों की साधना, अनुशासन और तकनीकी दक्षता का योगदान होता है, वहीं लोक कलाओं में किसी क्षेत्र की सामाजिक और सांस्कृतिक स्मृतियां अभिव्यक्त होती हैं। चक्रधर समारोह में इन दोनों धाराओं को स्थान मिलने से आयोजन का स्वरूप व्यापक बनता है। बच्चों और युवाओं के लिए ऐसे आयोजन कला के क्षेत्र में रुचि विकसित करने और पारंपरिक विधाओं से परिचित होने का माध्यम बन सकते हैं। स्थानीय कलाकारों और संस्थाओं के लिए भी बड़े सांस्कृतिक मंच पर प्रस्तुति का अवसर अपनी प्रतिभा को दर्शकों तक पहुंचाने का माध्यम होता है। राज्यपाल द्वारा उद्घाटन अवसर पर पूजा-अर्चना और दीप प्रज्ज्वलन किए जाने के बाद समारोह का सांस्कृतिक क्रम आगे बढ़ा, जिसमें गणेश वंदना से वातावरण में पारंपरिक आध्यात्मिकता और कला का समन्वय दिखाई दिया। प्रथम दिवस की आधिकारिक सूची में गणेश वंदना के बाद पंडवानी और लोक कला एवं संगीत की प्रस्तुतियों का उल्लेख है। इस क्रम में धार्मिक मंगलाचरण से सांस्कृतिक प्रस्तुतियों की ओर बढ़ना भारतीय समारोह परंपरा की परिचित संरचना को भी दर्शाता है। चक्रधर समारोह की निरंतरता रायगढ़ की सांस्कृतिक पहचान के लिए भी महत्वपूर्ण है और वर्ष 2026 के लिए जिला प्रशासन की वेबसाइट पर इसे 41वें चक्रधर समारोह के रूप में दर्ज किया गया है।
41वें चक्रधर समारोह का शुभारंभ भगवान श्री गणेश की पूजा-अर्चना और दीप प्रज्ज्वलन के साथ होने से समारोह की शुरुआत धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपरा के समन्वित वातावरण में हुई। राज्यपाल श्री रमेन डेका की उपस्थिति में हुए शुभारंभ ने समारोह के उद्घाटन को औपचारिक स्वरूप प्रदान किया, जबकि इसके बाद कलाकारों की प्रस्तुतियों ने आयोजन को सांस्कृतिक आयाम दिया। जिला रायगढ़ की आधिकारिक जानकारी के अनुसार 2026 के चक्रधर समारोह में सात दिनों के कार्यक्रम में अनेक भारतीय नृत्य, संगीत और लोककला विधाओं को शामिल किया गया है। प्रथम दिन गणेश वंदना, पंडवानी और लोक कला एवं संगीत से कार्यक्रम की शुरुआत हुई और आगे के दिनों में कथक, कुचिपुड़ी, ओडिसी, भरतनाट्यम, मणिपुरी, राजस्थानी फोक, पंडवानी, लोक नृत्य, लोक संगीत, कबीर भजन, गोटीपुआ और अन्य विधाओं की प्रस्तुतियों का क्रम रखा गया। इस आयोजन के माध्यम से कलाकारों को अपनी कला प्रस्तुत करने और दर्शकों को भारत की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित होने का अवसर मिल रहा है। समारोह की यह बहुविध संरचना रायगढ़ की उस सांस्कृतिक पहचान को भी सामने लाती है, जिसके साथ चक्रधर समारोह लंबे समय से जुड़ा हुआ है। भगवान गणेश की पूजा-अर्चना से शुभारंभ और दीप प्रज्ज्वलन के बाद सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का क्रम शुरू होना समारोह की पारंपरिक और सांस्कृतिक भावना को अभिव्यक्त करता है। आयोजन में शामिल कलाकारों की विविधता से यह भी स्पष्ट होता है कि समारोह में स्थानीय प्रतिभाओं के साथ देश के अलग-अलग क्षेत्रों की कला परंपराओं को मंच प्रदान किया गया है। सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और कला विधाओं के प्रति रुचि बढ़ाने की दृष्टि से ऐसे आयोजन महत्वपूर्ण मंच उपलब्ध कराते हैं। चक्रधर समारोह के माध्यम से रायगढ़ में कला और संस्कृति से जुड़े कलाकारों तथा दर्शकों का जुड़ाव बनता है और विभिन्न प्रदेशों की सांस्कृतिक अभिव्यक्तियां एक साझा मंच पर सामने आती हैं। राज्यपाल श्री रमेन डेका द्वारा भगवान गणेश की पूजा-अर्चना एवं दीप प्रज्ज्वलन से आरंभ हुआ यह 41वां समारोह इसी सांस्कृतिक परंपरा को आगे बढ़ाने वाला आयोजन है। जिला रायगढ़ की आधिकारिक वेबसाइट पर 2026 के समारोह के कार्यक्रम और प्रस्तुतियों का विवरण उपलब्ध है, जो आयोजन की व्यापकता और विविधता को दर्शाता है।