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खोखले लोग और खोखला रावण?

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Bureau Report
*खोखले लोग और खोखला रावण?*

रचना – राजेन्द्र सिंह जादौन

हर साल की तरह इस साल भी दशहरे के दिन मैदानों में भीड़ उमड़ेगी, पटाखे जलेंगे, तालियाँ बजेंगी, और फिर एक पुतले के जलने पर लोग चैन की साँस लेंगे। मानो किसी ने भीतर के पाप धो दिए हों, समाज से बुराई मिट गई हो, और अब दुनिया एक बार फिर सच्चाई के रास्ते पर लौट आई हो। पर कोई यह क्यों नहीं पूछता कि हर साल वही रावण क्यों जलाया जाता है जो कभी जीवित ही नहीं था? असली रावण तो आज भी जिंदा है, बस उसका रूप बदल गया है, उसका चेहरा अब जनता में ही बिखरा है। रावण, जिसे इतिहास ने राक्षस कहा, असल में ज्ञान का प्रतीक था। वही रावण जिसने शिव तांडव स्तोत्र जैसा अद्भुत काव्य रचा, जिसने रावण संहिता लिखी, जिसने ज्योतिष, आयुर्वेद और संगीत तक में अपनी छाप छोड़ी। पर विडम्बना यह है कि आज के ज्ञानी लोग, खोखले मंचों पर खड़े होकर, बाँस और कागज़ से बने रावण को जला कर खुद को धर्मरक्षक घोषित कर देते हैं। उन्हें यह एहसास ही नहीं कि वे असली रावण से डरते हैं, क्योंकि असली रावण उनके भीतर बैठा है और अपने भीतर झाँकने की हिम्मत किसी में नहीं।

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आज समाज खोखले मनकों से भरा है, हर चेहरा चमकदार है पर भीतर खाली। हर व्यक्ति दूसरों को बुरा कहने में माहिर है, पर खुद को परखने का साहस नहीं रखता। हर साल रावण जलता है, पर बुराई बढ़ती जाती है। महँगाई का रावण पेट में आग लगाता है, बेरोजगारी का रावण सपनों को निगलता है, भ्रष्टाचार का रावण हर व्यवस्था को खोखला करता है, और राजनीति का रावण धर्म, जाति, और आस्था को अपनी जिह्वा से चाटता रहता है। पर जनता इस सबको देख कर भी चुप है, क्योंकि उसे दशहरे की रात पटाखों की आवाज़ में ही मुक्ति का भ्रम चाहिए। कभी राम बुराई से लड़ने के प्रतीक थे, आज वही राम नारे में बदल दिए गए हैं। अब रावण से नहीं, एक-दूसरे से युद्ध है। धर्म के नाम पर अधर्म का व्यापार चल रहा है, और जो सबसे ऊँची आवाज़ में “जय श्रीराम” कहता है, वही अगले ही पल किसी की रोज़ी-रोटी, किसी की इज़्ज़त, या किसी की इंसानियत लूट लेता है।

रावण का पुतला जलाने से पहले कोई नहीं सोचता कि असली रावण तो इस समाज की नसों में दौड़ता है। वह सत्ता के गलियारों में बैठा है, जो वादे करता है, और वादों की राख से वोटों का रथ बनाता है। वह दफ्तरों में बैठा है, जहाँ फाइलें रिश्वत की रफ्तार से चलती हैं। वह सड़कों पर है, जो हादसे देखकर मोबाइल निकालते हैं, मदद नहीं। वह हमारे भीतर है, जब हम सच देखकर भी चुप रहते हैं, अन्याय देखकर भी मौन साध लेते हैं।

आज आदमी इतना खोखला हो गया है कि उसके पास अपनी सोच नहीं, बस वह सुनता है जो टीवी बताता है, वह मानता है जो सोशल मीडिया दिखाता है। उसे अपने दुख से ज्यादा नेता के ट्वीट की चिंता है, अपने भविष्य से ज्यादा किसी पार्टी के घोषणा पत्र की। उसके लिए अब ईश्वर भी राजनीतिक दलों की प्रतीक चिह्न बन चुके हैं।

घर में माँ-बाप की सेवा पुरानी बात हो गई है, अब भक्ति का केंद्र नेता हैं। उनके चरण छूकर लोग मोक्ष का प्रमाण पत्र पा लेते हैं। जो भगवान के मंदिर में सिर नहीं झुकाता, वह नेता के मंच पर जूते तक साफ करता है। यह भक्तिभाव नहीं, दासता है। यह आस्था नहीं, आत्मसमर्पण है।

दशहरा अब त्योहार नहीं, तमाशा है। एक ऐसा प्रदर्शन जहाँ लोग खुद को अच्छा साबित करने के लिए खोखले रावण जलाते हैं। वे भूल जाते हैं कि असली रावण को मारने के लिए राम का हृदय चाहिए, केवल तीर नहीं। आज हर व्यक्ति रावण है और हर कोई राम बनना चाहता है, पर किसी में तप, त्याग और सत्य की शक्ति नहीं।

आज धर्म, नीति, और संस्कृति केवल मंच की भाषणबाज़ी में रह गई है। बच्चे भूख से तड़प रहे हैं, और धर्म की रक्षा के नाम पर करोड़ों के आयोजन हो रहे हैं। मंदिर ऊँचे हो गए, इंसान नीचा हो गया। त्यौहार अब आत्मचिंतन का नहीं, विज्ञापन का हिस्सा हैं।

हर साल रावण जलता है, पर समाज और सड़ांध से भरता जाता है। क्योंकि किसी ने कभी यह नहीं सोचा कि जिस खोखले रावण को आग लगाई जा रही है, उसी की तरह हम भी खोखले होते जा रहे हैं। हमारे पास अब शब्द हैं, पर अर्थ नहीं; चेहरे हैं, पर चेहरों के पीछे चरित्र नहीं; भीड़ है, पर इंसान नहीं।

हम सब मिलकर उस पुतले को जलाते हैं जो कुछ नहीं कहता, पर उस सत्ता को नहीं जलाते जो हर दिन हमारी आशाओं को राख बना देती है। हम पटाखे फोड़ते हैं, नारे लगाते हैं, फोटो खिंचवाते हैं, और घर लौटकर फिर उसी अंधेरे में डूब जाते हैं जहाँ कोई प्रकाश नहीं, कोई राम नहीं।

सच यही है कि आज के लोग मनके हैं रंगीन, चमकदार, पर खोखले। ये खोखले लोग खोखला रावण जला रहे हैं, ताकि अपनी आत्मा के शोर को न सुन सकें। उन्हें लगता है कि हर साल रावण जलाने से बुराई खत्म हो जाएगी, पर वे भूल जाते हैं कि आग बाहर नहीं, भीतर लगानी पड़ती है।

जब तक आदमी अपने भीतर के रावण को नहीं मारेगा, तब तक हर दशहरा एक मज़ाक रहेगा। और इस मज़ाक में हम सब सहभागी हैं दर्शक भी, अभिनेता भी, और शायद… रावण भी।

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