
भोपाल। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को रेखांकित करते हुए सनातन संस्कृति में गुरु के सर्वोच्च स्थान का स्मरण किया गया। इस अवसर पर सभी गुरुजनों के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करते हुए समाज से ज्ञान, संस्कार और सेवा की परंपरा को आगे बढ़ाने का आह्वान किया गया। गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देशभर में धार्मिक, सामाजिक और शैक्षणिक संस्थानों में विविध कार्यक्रम आयोजित किए गए, जिनमें गुरुजनों का सम्मान कर उनके प्रति आभार प्रकट किया गया।
संदेश में कहा गया कि सनातन संस्कृति में गुरु केवल शिक्षा देने वाले शिक्षक नहीं हैं, बल्कि वे जीवन को अज्ञान के अंधकार से ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने वाले साक्षात् परब्रह्म स्वरूप माने गए हैं। गुरु ही व्यक्ति को सत्य, धर्म, कर्तव्य और मानवता का मार्ग दिखाते हैं तथा उसके व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु को माता-पिता के समान सम्मान दिया गया है और उनके मार्गदर्शन को जीवन की सबसे बड़ी पूंजी माना गया है।
गुरु पूर्णिमा का पर्व भारतीय संस्कृति की उस महान परंपरा का प्रतीक है, जिसमें ज्ञान को सर्वोच्च स्थान दिया गया है। यह पर्व महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। महर्षि वेदव्यास ने वेदों का संकलन, महाभारत की रचना तथा अनेक पुराणों की रचना कर भारतीय ज्ञान परंपरा को समृद्ध किया। इसी कारण उन्हें आदिगुरु के रूप में सम्मानित किया जाता है और गुरु पूर्णिमा के दिन उनके प्रति विशेष श्रद्धा व्यक्त की जाती है।
संदेश में कहा गया कि गुरु केवल शैक्षणिक ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में सही निर्णय लेने की प्रेरणा भी प्रदान करते हैं। उनके अनुभव, अनुशासन और मार्गदर्शन से व्यक्ति कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता विकसित करता है। गुरु द्वारा दिए गए संस्कार व्यक्ति को जिम्मेदार नागरिक बनने के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करने की प्रेरणा भी देते हैं।
गुरु-शिष्य परंपरा को भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर बताते हुए कहा गया कि प्राचीन काल से ही गुरुकुल व्यवस्था के माध्यम से विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ नैतिकता, अनुशासन, सेवा, त्याग और राष्ट्रभक्ति के संस्कार दिए जाते रहे हैं। यही परंपरा आज भी विभिन्न रूपों में समाज का मार्गदर्शन कर रही है। आधुनिक शिक्षा व्यवस्था में भी गुरु की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि बदलते समय में ज्ञान के साथ जीवन मूल्यों का संरक्षण भी आवश्यक है।
संदेश में यह भी कहा गया कि आज के डिजिटल युग में ज्ञान प्राप्त करने के अनेक साधन उपलब्ध हैं, लेकिन गुरु का स्थान कोई तकनीक या माध्यम नहीं ले सकता। गुरु अपने अनुभव, संवेदनशीलता और जीवन-दृष्टि से विद्यार्थियों को केवल जानकारी ही नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण निर्णय लेने की क्षमता भी प्रदान करते हैं। यही कारण है कि भारतीय संस्कृति में गुरु को ईश्वर के समान पूजनीय माना गया है।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर समाज के सभी वर्गों से अपने गुरुजनों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का आग्रह किया गया। साथ ही युवाओं से आह्वान किया गया कि वे अपने शिक्षकों और मार्गदर्शकों से प्राप्त ज्ञान एवं संस्कारों को जीवन में आत्मसात करते हुए समाज और राष्ट्र के विकास में सक्रिय योगदान दें। ज्ञान, सेवा, सदाचार और मानवता के मूल्यों को अपनाकर ही विकसित और संस्कारित भारत के निर्माण का संकल्प साकार किया जा सकता है।
अंत में समस्त गुरुजनों के श्रीचरणों में श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए सभी नागरिकों को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ दी गईं। कामना व्यक्त की गई कि गुरुजनों का आशीर्वाद सभी के जीवन में ज्ञान, विवेक, उत्तम स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता रहे तथा भारतीय संस्कृति की गौरवशाली गुरु-शिष्य परंपरा निरंतर आगे बढ़ती रहे।








