
राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश नारायण सिंह की वर्तमान पारी इस साल अप्रैल 2026 में समाप्त होने वाली है और इसी के मद्देनज़र संसद के गलियारों में जोरदार सियासी गणित और चर्चाएँ तेज़ हो गई हैं। मौजूदा उपसभापति हरिवंश 2018 से इस संवैधानिक पद पर हैं और दो अलग-अलग कार्यकालों में उन्होंने राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन किया है। उनके तीसरे कार्यकाल और उपसभापति की भूमिका को लेकर अब राजनीति में नया मोड़ दिखाई दे रहा है।
हरिवंश जी का इस पद पर दो बार चुनाव होना उनके राजनीतिक अनुभव और सदन संचालन कौशल को दर्शाता है, लेकिन तीसरी बार राज्यसभा में वापसी अब मुश्किल नजर आ रही है। उनके ही दल जनता दल (United) के अंदर बैठकें चल रही हैं और पार्टी के शीर्ष नेतृत्व इस बार जातिगत समीकरणों और सियासी रणनीति को ध्यान में रखकर किसी नए चेहरे को राज्यसभा भेजने का निर्णय ले सकती है, जिससे उपसभापति की कुर्सी पर भी बदलाव संभव हो।
चूंकि उपसभापति का पद राज्यसभा के सदस्य होने पर ही सम्भव है, इसलिए सबसे पहले हरिवंश का पुनः राज्यसभा सदस्य चुना जाना आवश्यक होता। लेकिन जेडीयू के अंदर यह चर्चा है कि वे इस साल उपसभापति हरिवंश को तीसरी बार राज्यसभा के लिए नामांकित नहीं करेंगे, जिसका असर उपसभापति की पारी पर पढ़ सकता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस बार राज्यसभा को नया उपसभापति मिल सकता है और इसके लिए उपसभापति चुनाव करवाना पड़ेगा।
राजनीतिक विश्लेषक यह भी मानते हैं कि उपसभापति के चुनाव में एनडीए गठबंधन का बहुमत एक निर्णायक भूमिका निभा सकता है, क्योंकि ruling coalition के पास सदन में पर्याप्त संख्या है। हालांकि हरिवंश के अनुभव और सभी पक्षों के साथ उनके कार्य-अनुभव को सकारात्मक रूप में देखा गया है, पार्टी की रणनीति इस बार अलग दिशा ले सकती है।
पार्लियामेंट में उपसभापति संवैधानिक पद होता है जो सदन के सभापति की अनुपस्थिति में राज्यसभा की कार्यवाही का संचालन करता है। जब 2025 में उपराष्ट्रपति (और राज्यसभा के सभापति) का इस्तीफा हुआ, तब हरिवंश ने वर्ष 2025 के मानसून सत्र की कार्यवाही की अध्यक्षता की और इस भूमिका में उन्होंने सीनियर नेताओं के साथ बातचीत भी की।
इस साल अप्रैल तक उपसभापति पद के रिटर्निंग ऑफ़िसर घोषित होते ही राज्यसभा में चुनाव गति पकड़ सकता है, जिसमें सदस्य दलों के बीच नामांकन, सहमति-मतदान और संभावित राजनीतिक सौदे शामिल होंगे। यह प्रक्रिया संविधान और संसदीय परंपरा के अनुरूप होगी, जिसमें नई उभरती राजनीतिक समीकरणों और गठबंधन रणनीतियों का भी प्रभाव देखा जाएगा।
कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि हरिवंश की वर्तमान पारी के समापन के साथ राज्यसभा में एक नया उपसभापति चुनने की प्रक्रिया इस साल अवश्य चलेगी, और यह देखने की बात होगी कि गठबंधन पार्टियाँ किस नेता को इस संवैधानिक पद के लिए आगे करती हैं और किस तालमेल के साथ निर्णय लिया जाता है।









