
नई दिल्ली। देश में वाहन उत्सर्जन और ईंधन दक्षता मानकों को और अधिक पारदर्शी तथा यथार्थपरक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण परिवर्तन की तैयारी है। विश्व स्तर पर प्रचलित ‘वर्ल्डवाइड हार्मोनाइज्ड लाइट व्हीकल टेस्ट प्रोसीजर’ अर्थात WLTP साइकिल को अपनाने की दिशा में नीति-निर्माताओं द्वारा गंभीर विचार-विमर्श किया जा रहा है। इसके साथ ही भारत में लागू भारत स्टेज-6 (BS-6) उत्सर्जन मानकों के अंतर्गत परीक्षण प्रक्रिया को और कठोर तथा वास्तविक परिस्थितियों के अनुरूप बनाने की योजना है। यदि यह व्यवस्था पूर्ण रूप से लागू होती है, तो वाहनों की माइलेज और उत्सर्जन क्षमता का आकलन केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वास्तविक सड़क परिस्थितियों में भी जांचा जाएगा।
वर्तमान में भारत में वाहनों की ईंधन दक्षता और उत्सर्जन का परीक्षण मुख्यतः नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में निर्धारित ड्राइविंग साइकिल के आधार पर किया जाता है। हालांकि यह प्रक्रिया तकनीकी रूप से मानकीकृत है, किंतु विशेषज्ञों का मत है कि प्रयोगशाला परीक्षण और वास्तविक सड़क परिस्थितियों में प्राप्त आंकड़ों के बीच अंतर देखा जाता है। इसी अंतर को कम करने और उपभोक्ताओं को अधिक यथार्थपरक जानकारी उपलब्ध कराने के उद्देश्य से WLTP जैसे वैश्विक मानकों की ओर कदम बढ़ाया जा रहा है।
WLTP साइकिल का उद्देश्य वाहन परीक्षण को अधिक वास्तविक बनाना है। इसमें गति, त्वरण, ब्रेकिंग और सड़क स्थितियों को पारंपरिक परीक्षणों की तुलना में अधिक विविध और गतिशील बनाया जाता है। इससे प्राप्त परिणाम वाहन के वास्तविक उपयोग के अधिक निकट माने जाते हैं। यूरोप और कई अन्य देशों में WLTP को पहले ही लागू किया जा चुका है, जिसके परिणामस्वरूप उत्सर्जन आंकड़ों में अधिक पारदर्शिता आई है।
भारत में BS-6 मानक पहले ही उत्सर्जन नियंत्रण के क्षेत्र में एक बड़ा कदम माने जाते हैं। वर्ष 2020 में लागू इन मानकों ने वाहनों से निकलने वाले नाइट्रोजन ऑक्साइड, पार्टिकुलेट मैटर और अन्य प्रदूषकों की सीमा को काफी कम कर दिया। अब BS-6 चरण-2 के अंतर्गत ऑन-बोर्ड डायग्नोस्टिक्स और रियल ड्राइविंग एमिशन जैसे प्रावधानों को लागू किया जा चुका है, जिनके माध्यम से वाहन की वास्तविक प्रदर्शन क्षमता की निगरानी की जाती है। WLTP साइकिल को अपनाने से इन प्रावधानों को और मजबूती मिल सकती है।
विशेषज्ञों के अनुसार, रियल-वर्ल्ड टेस्टिंग से वाहन निर्माताओं को अपने इंजन और उत्सर्जन नियंत्रण तकनीक को और उन्नत बनाना होगा। इससे न केवल पर्यावरण संरक्षण को बल मिलेगा, बल्कि उपभोक्ताओं को भी अधिक विश्वसनीय माइलेज आंकड़े प्राप्त होंगे। अक्सर देखा जाता है कि कंपनी द्वारा घोषित माइलेज और वास्तविक उपयोग में प्राप्त माइलेज के बीच अंतर होता है। WLTP के तहत परीक्षण पद्धति में सुधार से यह अंतर कम किया जा सकता है।
ऑटोमोबाइल उद्योग के प्रतिनिधियों का कहना है कि नई परीक्षण प्रणाली को लागू करने के लिए तकनीकी निवेश और अनुसंधान की आवश्यकता होगी। वाहन निर्माताओं को अपने उत्पादों को नए मानकों के अनुरूप ढालने के लिए अतिरिक्त संसाधन लगाने पड़ सकते हैं। हालांकि दीर्घकाल में यह निवेश उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता को बढ़ा सकता है, विशेषकर उन कंपनियों के लिए जो निर्यात बाजार में सक्रिय हैं। वैश्विक मानकों के अनुरूप उत्पादन से भारतीय वाहनों की स्वीकार्यता अंतरराष्ट्रीय बाजार में और बढ़ सकती है।
पर्यावरण विशेषज्ञों ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया है। उनका मानना है कि वायु प्रदूषण की चुनौती से निपटने के लिए केवल मानक निर्धारित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनकी प्रभावी निगरानी और क्रियान्वयन भी आवश्यक है। वास्तविक सड़क परीक्षण से उत्सर्जन में संभावित हेरफेर की संभावना कम होगी और प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में ठोस प्रगति संभव होगी।
सरकारी सूत्रों के अनुसार, WLTP को भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढालने पर भी विचार किया जा रहा है। देश की भौगोलिक और यातायात स्थितियां विविध हैं, जिनमें महानगरों की भीड़भाड़ से लेकर ग्रामीण सड़कों तक की परिस्थितियां शामिल हैं। इसलिए परीक्षण प्रक्रिया में स्थानीय वास्तविकताओं को ध्यान में रखना आवश्यक होगा। इस दिशा में तकनीकी समितियों और उद्योग प्रतिनिधियों के साथ परामर्श जारी है।
आर्थिक दृष्टि से यह परिवर्तन प्रारंभिक चरण में वाहनों की लागत को प्रभावित कर सकता है। उन्नत उत्सर्जन नियंत्रण प्रणाली, सेंसर और निगरानी उपकरणों के उपयोग से उत्पादन लागत बढ़ने की संभावना है। हालांकि प्रतिस्पर्धा और तकनीकी प्रगति के साथ यह लागत समय के साथ संतुलित हो सकती है। उपभोक्ताओं के लिए दीर्घकालिक लाभ स्वच्छ वातावरण, बेहतर ईंधन दक्षता और विश्वसनीय प्रदर्शन के रूप में सामने आ सकते हैं।
समापन में कहा जा सकता है कि WLTP साइकिल और सख्त BS-6 नियमों की दिशा में उठाया जा रहा कदम भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए एक महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत है। प्रयोगशाला परीक्षण से आगे बढ़कर वास्तविक सड़क परिस्थितियों में वाहनों की जांच पारदर्शिता और पर्यावरण संरक्षण की दिशा में निर्णायक साबित हो सकती है। आने वाले समय में यह स्पष्ट होगा कि उद्योग और नीति-निर्माता मिलकर इस परिवर्तन को किस प्रकार प्रभावी ढंग से लागू करते हैं, किंतु यह निश्चित है कि यह पहल भारत में स्वच्छ और उत्तरदायी परिवहन व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण अध्याय सिद्ध होगी।








