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HQ Report
सरगुजा की सांस्कृतिक विरासत, जनकल्याण और सुशासन के मूल्यों का ऐतिहासिक संदेश
इतिहास के स्वर्णिम पन्नों से वर्तमान पीढ़ी को प्रेरित करता है दशहरा दरबार का ऐतिहासिक भाषण
अंबिकापुर (सरगुजा), 14 जुलाई। छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल का इतिहास अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परंपराओं, लोकजीवन और जनकल्याणकारी दृष्टिकोण के लिए विशेष पहचान रखता है। इसी गौरवशाली विरासत का एक महत्वपूर्ण अध्याय वर्ष 1946 के दशहरा दरबार से जुड़ा है, जब हिज हाईनेस महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव, CBE ने अपने ऐतिहासिक संबोधन के माध्यम से जनसेवा, सुशासन, शिक्षा, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण जैसे विषयों पर प्रेरणादायी विचार प्रस्तुत किए। आज भी यह संबोधन ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है और सरगुजा की गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है।
दशहरा दरबार केवल उत्सव नहीं, जनसंवाद का मंच था
सरगुजा राजपरिवार में दशहरा का आयोजन केवल धार्मिक और सांस्कृतिक पर्व तक सीमित नहीं था। यह अवसर राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, जनकल्याणकारी योजनाओं तथा समाज के विभिन्न वर्गों से संवाद का महत्वपूर्ण माध्यम भी होता था। दशहरा दरबार में प्रशासनिक अधिकारी, जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, ग्रामीण क्षेत्रों के प्रतिनिधि तथा विभिन्न वर्गों के नागरिक उपस्थित होकर राज्य की गतिविधियों और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा करते थे। इस परंपरा ने शासन और समाज के बीच विश्वास तथा संवाद को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जनकल्याण को शासन का सर्वोच्च उद्देश्य बताया
अपने ऐतिहासिक संबोधन में महाराजा रामानुज शरण सिंहदेव ने जनकल्याण को किसी भी शासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी बताया। उन्होंने कहा कि प्रशासन का वास्तविक उद्देश्य जनता की आवश्यकताओं को समझते हुए उनके जीवन स्तर में सुधार लाना होना चाहिए। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि विकास तभी सार्थक होगा जब उसका लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और प्रत्येक नागरिक को समान अवसर प्राप्त हों।
शिक्षा को राष्ट्र और समाज की शक्ति माना










