
ब्यावरा। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर ब्यावरा स्थित शासकीय सांदीपनि उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में आयोजित “महर्षि सांदीपनि गुरु पर्व–2026” महोत्सव श्रद्धा, सम्मान और भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में सहभागिता करते हुए गुरुजनों, शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ आत्मीय संवाद स्थापित किया गया तथा सभी को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ दी गईं। इस अवसर पर भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा की गौरवशाली विरासत का स्मरण करते हुए गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त की गई।
कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चार एवं गुरु वंदना के साथ हुआ। इस अवसर पर उपस्थित सभी लोगों ने भारतीय संस्कृति में गुरु के सर्वोच्च स्थान का स्मरण करते हुए प्रसिद्ध श्लोक—
“गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः॥”

का सामूहिक उच्चारण किया। श्लोक के माध्यम से गुरु को सृजन, पालन और कल्याण का आधार बताते हुए उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की गई।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा गया कि भारतीय संस्कृति में गुरु केवल ज्ञान देने वाले शिक्षक नहीं होते, बल्कि वे व्यक्तित्व के निर्माता, संस्कारों के संवाहक और राष्ट्र निर्माण के प्रेरणास्रोत हैं। गुरु ही अपने ज्ञान, अनुभव और मार्गदर्शन से विद्यार्थियों के जीवन को नई दिशा प्रदान करते हैं। उनका स्नेह, अनुशासन और शिक्षण व्यक्ति को योग्य नागरिक बनने के साथ-साथ समाज और राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करने की प्रेरणा देता है।
शिक्षकों और विद्यार्थियों के साथ हुए आत्मीय संवाद में शिक्षा के महत्व, अनुशासन, नैतिक मूल्यों और संस्कारों पर विशेष बल दिया गया। विद्यार्थियों से कहा गया कि वे अपने गुरुजनों के प्रति सदैव सम्मान और कृतज्ञता का भाव रखें तथा शिक्षा को केवल परीक्षा तक सीमित न मानकर जीवन निर्माण का माध्यम समझें। गुरु का मार्गदर्शन जीवन में सफलता, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच विकसित करने का सबसे महत्वपूर्ण आधार है।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि भारत की गुरु-शिष्य परंपरा विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध परंपराओं में से एक है। महर्षि सांदीपनि, महर्षि वेदव्यास, आचार्य चाणक्य और अनेक महान गुरुओं ने अपने ज्ञान और तप से समाज को दिशा दी तथा राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज भी शिक्षकों की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि वे नई पीढ़ी के चरित्र निर्माण और भविष्य के भारत की नींव तैयार करते हैं।
इस अवसर पर सभी गुरुजनों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा गया कि शिक्षक केवल पाठ्यपुस्तकों का ज्ञान नहीं देते, बल्कि जीवन जीने की कला, नैतिकता, अनुशासन और सेवा के संस्कार भी प्रदान करते हैं। एक आदर्श शिक्षक अपने विद्यार्थियों के भीतर छिपी प्रतिभा को पहचानकर उसे निखारने का कार्य करता है और उन्हें अपने लक्ष्य प्राप्त करने के लिए प्रेरित करता है।
कार्यक्रम के दौरान पर्यावरण संरक्षण के संदेश को भी विशेष महत्व दिया गया। #एक_पेड़_माँ_नाम_अभियान के अंतर्गत गुलमोहर का पौधा रोपकर प्रकृति संरक्षण और पर्यावरण संवर्धन का संदेश दिया गया। इस अवसर पर कहा गया कि वृक्षारोपण केवल पर्यावरण बचाने का अभियान नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के प्रति हमारी जिम्मेदारी का प्रतीक है। प्रत्येक नागरिक को अधिक से अधिक पौधे लगाकर उनकी नियमित देखभाल करने का संकल्प लेना चाहिए।
कार्यक्रम में शिक्षकों के सम्मान के साथ विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरण संरक्षण, अनुशासन और राष्ट्रसेवा की भावना विकसित करने का संदेश भी दिया गया। उपस्थित शिक्षकों ने विद्यार्थियों को निरंतर अध्ययन, नैतिक जीवन और सकारात्मक सोच अपनाने की प्रेरणा दी।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर समस्त गुरुजनों के चरणों में श्रद्धापूर्वक नमन करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की गई। साथ ही ईश्वर से प्रार्थना की गई कि सभी शिक्षकों का स्नेह, आशीर्वाद और मार्गदर्शन सदैव समाज और राष्ट्र को नई ऊँचाइयों की ओर अग्रसर करता रहे।
कार्यक्रम का समापन गुरु वंदना, वृक्षारोपण और सभी प्रदेशवासियों को गुरु पूर्णिमा की हार्दिक शुभकामनाएँ देने के साथ हुआ। इस अवसर पर यह संदेश दिया गया कि गुरु का सम्मान, शिक्षा का प्रसार, संस्कारों का संरक्षण और प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी—ये सभी विकसित, संस्कारित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के मजबूत आधार हैं।








