
कहा — समाज में जागरूकता बढ़ाने की सख्त जरूरत, नहीं तो कानून का उद्देश्य हो जाएगा कमजोर
नई दिल्ली। देश के सर्वोच्च न्यायालय ने पॉक्सो (POCSO) अधिनियम के दुरुपयोग पर गहरी चिंता जताई है। अदालत ने कहा कि बाल संरक्षण के उद्देश्य से बनाए गए इस कानून का दुरुपयोग बढ़ना समाज के लिए बेहद चिंताजनक है। न्यायालय ने यह भी कहा कि अगर इस कानून का उपयोग अनुचित या बदले की भावना से किया जाने लगा, तो इससे वास्तविक पीड़ितों के अधिकार प्रभावित होंगे और कानून की साख कमजोर पड़ जाएगी।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने
मुख्य न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ ने सोमवार को एक याचिका की सुनवाई के दौरान कहा —
“हम देख रहे हैं कि पॉक्सो के कई मामलों में आरोप झूठे या अतिशयोक्तिपूर्ण पाए जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति न केवल निर्दोष लोगों को नुकसान पहुंचा रही है बल्कि वास्तविक पीड़ितों के लिए न्याय की प्रक्रिया को भी प्रभावित कर रही है।”
पीठ ने कहा कि समाज में पॉक्सो कानून को लेकर गलतफहमियां और कानूनी जानकारी की कमी है। अदालत ने केंद्र और राज्य सरकारों से आग्रह किया कि वे स्कूलों, अभिभावकों और शिक्षकों के बीच जागरूकता अभियान चलाएं ताकि इस कानून का सही उद्देश्य समझा जा सके।
पॉक्सो अधिनियम का उद्देश्य
“Protection of Children from Sexual Offences Act (POCSO)”, वर्ष 2012 में लागू हुआ था। इसका मुख्य उद्देश्य 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधों से सुरक्षा देना है।
इस कानून में कठोर दंड का प्रावधान है और इसमें किसी भी तरह की ढिलाई या समझौते की अनुमति नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कानून बच्चों की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया था, न कि “हर असहमति या सामाजिक विवाद” में हथियार के रूप में इस्तेमाल करने के लिए।
अदालत ने दी चेतावनी
सुनवाई के दौरान अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि झूठे मामलों में शामिल लोगों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए।
अदालत ने कहा —
“किसी निर्दोष व्यक्ति को झूठे आरोप में फंसाना एक गंभीर अपराध है। यदि पॉक्सो जैसी संवेदनशील धारा का गलत उपयोग होता है, तो यह न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता को चोट पहुंचाता है।”
पीठ ने यह भी जोड़ा कि अदालतें हर मामले में “संदेह से परे प्रमाण” के सिद्धांत को ध्यान में रखें, ताकि निर्दोष लोगों को सजा न मिले और असली अपराधियों को दंड मिल सके।
अदालत ने जागरूकता बढ़ाने पर दिया जोर
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से कहा कि वे जागरूकता अभियान चलाकर समाज को बताएं कि पॉक्सो कानून किन स्थितियों में लागू होता है।
न्यायालय ने यह भी सुझाव दिया कि शिक्षा मंत्रालय और महिला एवं बाल विकास मंत्रालय मिलकर स्कूलों में “लीगल लिटरेसी प्रोग्राम” शुरू करें, ताकि विद्यार्थी, शिक्षक और अभिभावक कानूनी प्रावधानों को सही ढंग से समझ सकें।
हाल के मामलों पर भी उठे सवाल
पिछले कुछ वर्षों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां सहमति से संबंध या परिवारिक विवादों को पॉक्सो कानून के तहत दर्ज किया गया।
कई हाईकोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि “सहमति देने वाली किशोर उम्र की लड़कियों” के मामलों में कानून के प्रावधानों का सावधानी से इस्तेमाल होना चाहिए, ताकि असली अपराध और आपसी विवाद के बीच अंतर किया जा सके।
कई बार मामूली झगड़ों या अभिभावकों की असहमति के चलते युवक-युवती के रिश्ते को अपराध की श्रेणी में डाल दिया जाता है, जिससे कानून का उद्देश्य कमजोर पड़ता है।
न्यायपालिका की संवेदनशीलता पर बल
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि न्यायपालिका का उद्देश्य कानून का अंधाधुंध प्रयोग नहीं, बल्कि न्याय सुनिश्चित करना है।
पीठ ने कहा —
“पॉक्सो कानून का दुरुपयोग रोकना उतना ही आवश्यक है जितना इसका कड़ाई से पालन करना। न्यायाधीशों को संवेदनशीलता और विवेक के साथ निर्णय लेने होंगे।”









