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‘लड़ाई अपनी-अपनी’ कविता ने दिया मानवता, समानता और भाईचारे का संदेश

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ग्वालियर। समाज में बढ़ती वैचारिक कटुता, धार्मिक विभाजन और आपसी संघर्ष के दौर में लेखिका आशी प्रतिभा दुबे की कविता ‘लड़ाई अपनी-अपनी’ मानवता, समानता और सामाजिक सौहार्द का सशक्त संदेश देती है। कविता यह बताती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी लड़ाई किसी दूसरे धर्म, जाति या समुदाय से नहीं, बल्कि अपनी सोच, अहंकार और संकीर्ण मानसिकता से है।
लेखिका ने अपनी रचना में स्पष्ट किया है कि मंदिर और दरगाह में विराजमान ईश्वर और अल्लाह कभी भी मनुष्यों के बीच वैमनस्य या संघर्ष का कारण नहीं बनते। आपसी विवाद और भेदभाव मनुष्य की अपनी सोच और स्वार्थ का परिणाम हैं। यदि व्यक्ति अपनी नकारात्मक सोच से स्वयं संघर्ष करे, तो समाज में शांति और सौहार्द स्थापित हो सकता है।
कविता में प्रकृति का उदाहरण देते हुए लेखिका ने प्रश्न उठाया है कि क्या हवा कभी किसी के साथ भेदभाव करती है? क्या पानी कभी यह तय करता है कि वह किसी विशेष वर्ग पर ही बरसे? क्या धूप किसी के आंगन तक पहुँचने से इंकार करती है? क्या मौसम कभी किसी व्यक्ति के लिए अलग रूप धारण करता है? इन प्रश्नों के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि प्रकृति सभी के साथ समान व्यवहार करती है, जबकि भेदभाव केवल मनुष्य की बनाई हुई अवधारणा है।
रचना यह भी बताती है कि लोग अक्सर अपनी पहचान, विचारधारा और अस्तित्व को बचाने के नाम पर समूह बनाकर संघर्ष करते हैं, जबकि वास्तविकता में हर व्यक्ति की अपनी-अपनी सोच और अपनी-अपनी लड़ाई होती है। यदि मानवता को सर्वोपरि रखा जाए तो अधिकांश सामाजिक विवाद स्वतः समाप्त हो सकते हैं।
साहित्य प्रेमियों का मानना है कि ‘लड़ाई अपनी-अपनी’ केवल एक कविता नहीं, बल्कि समाज को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करने वाला संदेश है। यह रचना भाईचारा, सामाजिक समरसता, धार्मिक सद्भाव और समानता जैसे मूल्यों को मजबूत करने का आह्वान करती है तथा पाठकों को यह सोचने पर विवश करती है कि प्रकृति ने कभी किसी के साथ भेदभाव नहीं किया, इसलिए मनुष्य को भी समानता और मानवता का मार्ग अपनाना चाहिए।
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