
पंडवानी की विश्वविख्यात गायिका के निधन से देशभर में शोक, लोककला जगत ने खोया अपना सबसे बड़ा सितारा
रायपुर। छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे देश और विश्व के लोककला प्रेमियों के लिए अत्यंत दुखद समाचार सामने आया है। पंडवानी गायन की विश्वविख्यात स्वर-सम्राज्ञी, पद्म विभूषण से सम्मानित लोक कलाकार तीजन बाई का देर रात लगभग 3:15 बजे रायपुर स्थित एम्स अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही भारतीय लोक संस्कृति का एक स्वर्णिम अध्याय इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया। छत्तीसगढ़ की मिट्टी की खुशबू को अपनी आवाज के माध्यम से देश-दुनिया तक पहुंचाने वाली इस महान कलाकार के जाने से कला, संस्कृति और साहित्य जगत में गहरा शोक व्याप्त है। तीजन बाई केवल एक लोक गायिका नहीं थीं, बल्कि वे छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक पहचान, लोक परंपरा और भारतीय कला की सशक्त प्रतिनिधि थीं। उन्होंने पंडवानी जैसी पारंपरिक लोककला को गांवों की चौपाल से निकालकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक पहुंचाया और दुनिया को भारतीय लोकसंस्कृति की समृद्ध विरासत से परिचित कराया। उनकी विशिष्ट गायन शैली, दमदार प्रस्तुति और अभिनय से भरपूर अभिव्यक्ति ने लाखों लोगों को मंत्रमुग्ध किया। महाभारत की कथाओं को लोकभाषा और लोकशैली में जीवंत कर प्रस्तुत करने की उनकी कला अद्वितीय थी। मंच पर हाथ में तंबूरा लेकर पात्रों का अभिनय करते हुए कथा का ऐसा चित्रण करती थीं कि दर्शक स्वयं को महाभारत के युद्धक्षेत्र में उपस्थित महसूस करने लगते थे। यही उनकी सबसे बड़ी पहचान बनी और इसी कला ने उन्हें राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर असाधारण सम्मान दिलाया।
छत्तीसगढ़ के एक साधारण ग्रामीण परिवेश से निकलकर विश्व मंच तक पहुंचने का उनका सफर संघर्ष, समर्पण और आत्मविश्वास की मिसाल रहा। सामाजिक रूढ़ियों और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद उन्होंने कभी हार नहीं मानी। पुरुष प्रधान मानी जाने वाली पंडवानी शैली में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई और यह साबित किया कि प्रतिभा किसी भी सीमा की मोहताज नहीं होती। तीजन बाई को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में शामिल पद्मश्री, पद्मभूषण और बाद में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। इसके अतिरिक्त उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, नृत्य शिरोमणि, कालिदास सम्मान सहित अनेक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुए। उनके सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धियां नहीं थे, बल्कि छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति को मिली वैश्विक पहचान का प्रतीक थे। उन्होंने फ्रांस, ब्रिटेन, जापान, रूस, जर्मनी, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया सहित अनेक देशों में अपनी प्रस्तुतियां देकर भारतीय लोककला का परचम लहराया। विदेशी दर्शकों ने भी उनकी प्रस्तुति को उतनी ही आत्मीयता से स्वीकार किया जितना भारत के ग्रामीण अंचलों ने। तीजन बाई का जीवन नई पीढ़ी के कलाकारों के लिए प्रेरणा का स्रोत रहा। उन्होंने अनेक युवा कलाकारों को पंडवानी की बारीकियां सिखाईं और लोक परंपरा को जीवित रखने का निरंतर प्रयास किया। उनके शिष्यों की लंबी श्रृंखला आज देश के विभिन्न हिस्सों में इस कला का प्रचार-प्रसार कर रही है।
उनके निधन की सूचना मिलते ही प्रदेशभर में शोक की लहर दौड़ गई। कला, साहित्य, राजनीति, प्रशासन और सामाजिक क्षेत्र से जुड़े लोगों ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि यह केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, बल्कि पूरे भारतीय सांस्कृतिक जगत की अपूरणीय क्षति है। लोक कलाकारों का कहना है कि तीजन बाई ने पंडवानी को केवल जीवित नहीं रखा, बल्कि उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। यदि उनका योगदान नहीं होता तो संभवतः यह लोककला विश्व स्तर पर इतनी लोकप्रिय नहीं हो पाती। सांस्कृतिक विशेषज्ञों के अनुसार तीजन बाई भारतीय लोक परंपरा की जीवंत विरासत थीं। उन्होंने आधुनिक समय में भी यह सिद्ध किया कि लोककला कभी पुरानी नहीं होती, यदि उसे पूरी निष्ठा और आत्मा के साथ प्रस्तुत किया जाए। छत्तीसगढ़ के गांवों में आज भी लोग उनकी प्रस्तुतियों को याद करते हैं। अनेक घरों में उनकी रिकॉर्डिंग सुरक्षित रखी गई है, जिन्हें सुनकर नई पीढ़ी लोककला से जुड़ रही है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है। उनके निधन से पंडवानी कला का एक युग समाप्त अवश्य हुआ है, लेकिन उनकी आवाज, उनकी शैली और उनकी कला आने वाली पीढ़ियों को सदैव प्रेरित करती रहेगी। भारतीय संस्कृति के इतिहास में उनका नाम स्वर्ण अक्षरों में सदैव अंकित रहेगा। पद्म विभूषण तीजन बाई को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करता है और ईश्वर से प्रार्थना करता है कि दिवंगत पुण्यात्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान प्रदान करें तथा शोक संतप्त परिवार, उनके शिष्यों और समस्त कला प्रेमियों को इस असहनीय दुःख को सहने की शक्ति दें।









