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HQ Report
जबलपुर। गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर माँ नर्मदा के दिव्य तट पर स्थित श्री आनंदम धाम पीठ में आयोजित भव्य गुरु पूर्णिमा महोत्सव श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक ऊर्जा के वातावरण में संपन्न हुआ। इस अवसर पर देशभर से आए संत-महात्माओं, श्रद्धालुओं और भक्तों की उपस्थिति ने पूरे परिसर को आध्यात्मिक चेतना से सराबोर कर दिया। महोत्सव में श्री आनंदम धाम पीठ के पीठाधीश्वर परमपूज्य सद्गुरु श्री ऋतेश्वर जी महाराज के दिव्य सान्निध्य में सहभागी होकर संतजनों का आशीर्वाद प्राप्त किया गया। इस अवसर पर गुरु परंपरा, भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों और समाज में संतों की भूमिका पर विस्तृत विचार व्यक्त किए गए। श्रद्धालुओं ने गुरुदेव के श्रीचरणों में श्रद्धा अर्पित करते हुए राष्ट्र, समाज और मानवता के कल्याण की कामना की।
कार्यक्रम के दौरान कहा गया कि भारत की आध्यात्मिक परंपरा में गुरु का स्थान सर्वोच्च माना गया है। गुरु केवल ज्ञान देने वाले शिक्षक नहीं होते, बल्कि वे व्यक्ति के जीवन को सही दिशा देने वाले मार्गदर्शक होते हैं। गुरु अपने शिष्य के भीतर आत्मविश्वास, संस्कार, अनुशासन और आध्यात्मिक चेतना का संचार करते हैं। भारतीय संस्कृति में गुरु को ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूजनीय माना गया है, क्योंकि वे अज्ञान रूपी अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश फैलाते हैं। गुरु पूर्णिमा का पर्व इसी गुरु-शिष्य परंपरा के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है।

महोत्सव में उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा गया कि माँ नर्मदा का पावन तट सदियों से ऋषियों, मुनियों, संतों और तपस्वियों की साधना भूमि रहा है। इस पवित्र धरा पर संतों का आगमन सदैव समाज के लिए सौभाग्य का विषय माना जाता है। नर्मदा तट केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय आध्यात्मिक परंपरा और संस्कृति का जीवंत प्रतीक भी है। यहाँ संतों का सान्निध्य लोगों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा, आत्मिक शांति और नैतिक मूल्यों का संचार करता है।
परमपूज्य सद्गुरु श्री ऋतेश्वर जी महाराज के श्रीचरणों में श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा गया कि उनका मार्गदर्शन समाज को सेवा, संस्कार, राष्ट्रभक्ति और आध्यात्मिक उन्नति की दिशा में निरंतर प्रेरित कर रहा है। उन्होंने अपने प्रवचनों और आध्यात्मिक संदेशों के माध्यम से समाज में सद्भाव, नैतिकता, करुणा और मानवता के मूल्यों को सुदृढ़ करने का कार्य किया है। उनके सान्निध्य में आयोजित गुरु पूर्णिमा महोत्सव श्रद्धालुओं के लिए आत्मिक ऊर्जा प्राप्त करने और जीवन को नई दिशा देने का महत्वपूर्ण अवसर बना।
कार्यक्रम के दौरान संतों ने अपने प्रवचनों में भारतीय संस्कृति में गुरु की महिमा का विस्तार से वर्णन किया। उन्होंने कहा कि गुरु केवल धार्मिक शिक्षा ही नहीं देते, बल्कि व्यक्ति को जीवन जीने की सही कला भी सिखाते हैं। गुरु के मार्गदर्शन में चलने वाला व्यक्ति कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य, विवेक और सकारात्मक सोच बनाए रखता है। संतों ने युवाओं से भारतीय संस्कृति, आध्यात्मिक परंपरा और नैतिक मूल्यों को अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि चरित्र निर्माण ही राष्ट्र निर्माण का सबसे मजबूत आधार है।

महोत्सव के दौरान श्रद्धालुओं ने माँ नर्मदा की पूजा-अर्चना कर प्रदेश और देश की सुख-समृद्धि, शांति एवं खुशहाली की कामना की। वैदिक मंत्रोच्चार, भजन-कीर्तन और आध्यात्मिक प्रवचनों से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। श्रद्धालुओं ने गुरु पूजन कर अपने जीवन में गुरु के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का भाव व्यक्त किया। बड़ी संख्या में उपस्थित भक्तों ने संतों का आशीर्वाद प्राप्त कर समाज में सदाचार, सेवा और मानवता के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
कार्यक्रम में यह भी कहा गया कि वर्तमान समय में जब समाज अनेक सामाजिक और नैतिक चुनौतियों का सामना कर रहा है, तब संतों का मार्गदर्शन और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। संत समाज लोगों को संयम, सेवा, प्रेम, सद्भाव और नैतिक जीवन जीने की प्रेरणा देता है। समाज में बढ़ती नकारात्मक प्रवृत्तियों को दूर करने तथा युवाओं को सकारात्मक दिशा देने में संतों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनके विचार सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने में भी महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।
गुरु पूर्णिमा महोत्सव में विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया गया। भक्ति संगीत, वेदपाठ, सत्संग और आध्यात्मिक चर्चा के माध्यम से श्रद्धालुओं को भारतीय संस्कृति की गौरवशाली परंपराओं से परिचित कराया गया। संतों ने कहा कि गुरु के प्रति श्रद्धा केवल एक दिन का उत्सव नहीं, बल्कि जीवनभर अपनाए जाने वाले संस्कार का प्रतीक है। गुरु के बताए मार्ग पर चलकर ही व्यक्ति अपने जीवन को सफल और सार्थक बना सकता है।










