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हैदराबाद विश्वविद्यालय में 18 सितंबर को होगा ग्लोबल सुपर-30 अवार्ड एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनार-2026

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भारतीय प्रवासी परिवारों में सामाजिक परिवर्तन, पारिवारिक कल्याण और नीतिगत प्रतिक्रियाओं पर होगा व्यापक अकादमिक विमर्श; ‘विकास-दिशा’ पुस्तक का लोकार्पण और ‘गिरमिटिया’ नाटक का मंचन भी आकर्षण
हैदराबाद। भारतीय प्रवासी परिवारों के बदलते सामाजिक, पारिवारिक और सांस्कृतिक स्वरूप को समझने तथा प्रवासी समुदाय से जुड़े समकालीन प्रश्नों पर अकादमिक एवं सामाजिक संवाद को व्यापक मंच प्रदान करने के उद्देश्य से 18 सितंबर 2026 को हैदराबाद विश्वविद्यालय में ‘ग्लोबल सुपर-30 अवार्ड एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनार-2026’ का आयोजन किया जाएगा। कार्यक्रम का आयोजन गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर, भारतीय प्रवासी अध्ययन केंद्र (CSID), हैदराबाद विश्वविद्यालय तथा एस.आर.एम. विश्वविद्यालय, दिल्ली-एनसीआर, सोनीपत के संयुक्त प्रयास से किया जा रहा है। कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः 9:30 बजे प्रस्तावित है तथा आयोजन स्थल हैदराबाद विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ सोशल साइंसेज स्थित कॉन्फ्रेंस हॉल, प्रो. सी.आर. राव रोड, सेंट्रल यूनिवर्सिटी पी.ओ., गाचीबोवली, हैदराबाद, तेलंगाना-500046 रहेगा। आयोजकों के अनुसार इस अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का मुख्य विषय “संक्रमणशील भारतीय प्रवासी परिवार : सामाजिक परिवर्तन, पारिवारिक कल्याण एवं नीतिगत प्रतिक्रियाएं” रखा गया है, जिसका अंग्रेजी रूप Indian Diaspora Families in Transition: Social Change, Family Well-being, and Policy Responses है। आयोजन का उद्देश्य भारतीय प्रवासी परिवारों में समय के साथ हो रहे परिवर्तनों को केवल सामाजिक दृष्टि से देखना नहीं, बल्कि उनके पारिवारिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, शैक्षणिक और नीतिगत पहलुओं पर भी गंभीर विमर्श करना है। वैश्वीकरण, अंतरराष्ट्रीय प्रवासन, रोजगार के बदलते अवसर, डिजिटल माध्यमों का विस्तार और विभिन्न देशों में भारतीय समुदायों की बढ़ती उपस्थिति ने पारिवारिक जीवन को अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है। ऐसे समय में प्रवासी परिवारों की संरचना, पारिवारिक संबंधों, सामाजिक भूमिकाओं, सांस्कृतिक पहचान और नई पीढ़ी के अनुभवों को समझना महत्वपूर्ण हो जाता है। इसी व्यापक संदर्भ में आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम शोधकर्ताओं, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, साहित्यकारों, नीति विशेषज्ञों, प्रवासी समुदाय से जुड़े प्रतिनिधियों और विभिन्न क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तित्वों को संवाद का अवसर प्रदान करेगा। आयोजन की विशेषता यह भी होगी कि इसमें अकादमिक विमर्श के साथ साहित्य, संस्कृति और सामाजिक सरोकारों को जोड़ा गया है। कार्यक्रम में ‘विकास-दिशा’ नामक पुस्तक का लोकार्पण तथा डॉ. सुधांशु कुमार चक्रवर्ती द्वारा प्रवासी मजदूरों के जीवन और अनुभवों पर आधारित ‘गिरमिटिया’ एकल नाटक का मंचन प्रस्तावित है। इस प्रकार आयोजन ज्ञान, शोध, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक संवाद के विभिन्न आयामों को एक मंच पर लाने का प्रयास करेगा। कार्यक्रम में शामिल होने वाले प्रतिभागियों के लिए यह अवसर भारतीय प्रवासी समाज से जुड़े विविध अनुभवों को सुनने, समझने और उन पर विचार करने का माध्यम बनेगा। आयोजकों का मानना है कि वर्तमान समय में प्रवासी परिवारों के अनुभवों और उनके सामने उपस्थित चुनौतियों पर तथ्यपरक, संवेदनशील और समाधानपरक चर्चा की आवश्यकता है। इस दिशा में हैदराबाद विश्वविद्यालय जैसे प्रतिष्ठित अकादमिक परिसर में होने वाला यह आयोजन शोध एवं संवाद की संभावनाओं को और व्यापक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकता है।
प्रवासी परिवारों के बदलते स्वरूप पर केंद्रित होगा अंतरराष्ट्रीय अकादमिक विमर्श
सेमिनार का मुख्य विषय भारतीय प्रवासी परिवारों में हो रहे सामाजिक परिवर्तन, पारिवारिक कल्याण और नीतिगत प्रतिक्रियाओं से संबंधित है। इसके अंतर्गत भारतीय प्रवासी परिवारों के बदलते स्वरूप और उनके जीवन से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण पहलुओं पर विशेषज्ञों एवं शोधकर्ताओं द्वारा विचार-विमर्श किया जाएगा। आज भारतीय समुदाय दुनिया के अनेक देशों में शिक्षा, व्यवसाय, रोजगार, अनुसंधान, तकनीक, चिकित्सा, उद्योग और विभिन्न पेशेवर क्षेत्रों में सक्रिय है। विदेशों में रहने वाले भारतीय परिवार अपने साथ भाषा, परंपरा, संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक स्मृतियों को भी लेकर जाते हैं, लेकिन नए देश की सामाजिक व्यवस्था, कार्य संस्कृति और जीवनशैली के साथ उनका निरंतर संवाद होता रहता है। इस प्रक्रिया में परिवारों के स्वरूप, पारिवारिक संबंधों, बच्चों की शिक्षा, सांस्कृतिक पहचान और पीढ़ियों के बीच संबंधों में परिवर्तन स्वाभाविक रूप से देखने को मिलता है। सेमिनार में इन्हीं परिवर्तनों को व्यापक अकादमिक दृष्टि से समझने का प्रयास किया जाएगा। आयोजन की प्रमुख विशेषताओं में प्रवासी परिवारों के लिए नीतिगत पहल, प्रवासी परिवारों की संरचना, संबंध और कल्याण, प्रवासी महिलाओं की भूमिका एवं सशक्तिकरण, शिक्षा, संस्कृति और प्रवासी परिवार, डिजिटल माध्यम, प्रवास और परिवार के संबंध, स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य एवं सामाजिक न्याय, तथा संस्कृति, समाज और प्रवासन संवाद जैसे विषय शामिल किए गए हैं। इन विषयों के माध्यम से प्रवासी जीवन को केवल आर्थिक या रोजगार संबंधी दृष्टिकोण से नहीं, बल्कि मानवीय और सामाजिक दृष्टि से समझने का प्रयास होगा। प्रवासी परिवारों में महिलाओं की भूमिका, बच्चों और युवाओं की पहचान, परिवार के भीतर पीढ़ीगत संवाद, डिजिटल माध्यमों के कारण बदलते पारिवारिक संबंध और विभिन्न देशों की नीतियों का परिवारों पर प्रभाव जैसे मुद्दे वर्तमान समय में विशेष महत्व रखते हैं। इसी प्रकार स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य भी प्रवासी परिवारों के कल्याण का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। नए सामाजिक परिवेश में समायोजन, रोजगार का दबाव, पारिवारिक दूरी और सांस्कृतिक संक्रमण जैसी परिस्थितियां परिवारों के अनुभवों को प्रभावित कर सकती हैं। सेमिनार में ऐसे विषयों पर शोध आधारित प्रस्तुतियों और परिचर्चाओं के माध्यम से विभिन्न दृष्टिकोण सामने आने की संभावना है। आयोजकों का उद्देश्य इस विमर्श को किसी एक क्षेत्र तक सीमित रखना नहीं, बल्कि समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान, अर्थशास्त्र, कानून, शिक्षा, संस्कृति, साहित्य और सार्वजनिक नीति जैसे विभिन्न विषयों के बीच संवाद स्थापित करना है। भारतीय प्रवासी परिवारों के अध्ययन में बहुविषयक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, क्योंकि प्रवासन का प्रभाव जीवन के अनेक क्षेत्रों पर पड़ता है। परिवार एक सामाजिक संस्था होने के साथ आर्थिक, सांस्कृतिक और भावनात्मक इकाई भी है। इसलिए उसके परिवर्तन को समझने के लिए विभिन्न विषयों के विशेषज्ञों की सहभागिता उपयोगी हो सकती है। सेमिनार इसी बहुआयामी दृष्टिकोण को सामने लाने का मंच बनेगा। देश के विभिन्न राज्यों के विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों और शोध संस्थानों से शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों और शोधार्थियों की सहभागिता प्रस्तावित है। इसके साथ ही भारतीय प्रवासी समुदाय से जुड़े प्रतिनिधियों और विदेशों में कार्यरत विशेषज्ञों की भागीदारी से संवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप मिलने की संभावना है। इस प्रकार यह आयोजन शोध एवं अनुभव के बीच सेतु बनाने का प्रयास करेगा।
गोपाल किरन समाजसेवी संस्था की पहल, श्रीप्रकाश सिंह निमराजे के नेतृत्व में आयोजन को आकार
इस अंतरराष्ट्रीय आयोजन की प्रमुख सहयोगी संस्था गोपाल किरन समाजसेवी संस्था (GKSSS), ग्वालियर है, जिसकी ओर से अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे आयोजन को लेकर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। संस्था सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों को अकादमिक विमर्श से जोड़ने के उद्देश्य से इस कार्यक्रम को व्यापक स्वरूप देने की दिशा में कार्य कर रही है। आयोजन की अवधारणा में ज्ञान, शोध, संस्कृति और सामाजिक सहभागिता को समान महत्व दिया गया है। श्रीप्रकाश सिंह निमराजे के अनुसार इस प्रकार के कार्यक्रमों का उद्देश्य केवल किसी एक दिन का आयोजन करना नहीं, बल्कि ऐसे विषयों पर निरंतर संवाद की संभावनाएं विकसित करना है जिनका प्रभाव समाज और परिवारों के जीवन पर पड़ता है। भारतीय प्रवासी परिवार आज विश्व के अनेक हिस्सों में अपनी अलग पहचान बनाए हुए हैं। प्रवासी समुदाय के अनुभवों में भारतीय संस्कृति और स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों का एक विशिष्ट समन्वय देखने को मिलता है। इस सामाजिक परिवर्तन को समझने के लिए शोध और अनुभव दोनों को एक साथ रखना जरूरी है। इसी विचार के साथ कार्यक्रम को अकादमिक संस्थानों के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। भारतीय प्रवासी अध्ययन केंद्र, हैदराबाद विश्वविद्यालय की सहभागिता इस विषय के अकादमिक महत्व को रेखांकित करती है, जबकि एस.आर.एम. विश्वविद्यालय, दिल्ली-एनसीआर, सोनीपत का सहयोग इसे उच्च शिक्षा एवं शोध के व्यापक नेटवर्क से जोड़ता है। आयोजकों का प्रयास है कि देश के विभिन्न हिस्सों से आने वाले प्रतिभागियों को एक साझा मंच मिले, जहां वे अपने शोध, अनुभव और विचार प्रस्तुत कर सकें। कार्यक्रम में शोध-पत्र प्रस्तुतियों, विशेषज्ञ व्याख्यानों, परिचर्चाओं और संवाद के माध्यम से विभिन्न विषयों पर विचार-विमर्श प्रस्तावित है। शोधार्थियों और युवा शिक्षाविदों के लिए भी यह मंच विशेष उपयोगी हो सकता है, क्योंकि उन्हें अपने अध्ययन से जुड़े विषयों को विशेषज्ञों के सामने प्रस्तुत करने और अन्य शोधकर्ताओं के विचार सुनने का अवसर मिलेगा। इसी क्रम में आयोजन को साहित्य और रंगमंच से जोड़ने का निर्णय भी इसे विशिष्ट बनाता है। आयोजकों का मानना है कि सामाजिक विषयों को केवल आंकड़ों और शोध-पत्रों के माध्यम से ही नहीं, बल्कि साहित्य और नाट्य अभिव्यक्ति के माध्यम से भी प्रभावी ढंग से समझा जा सकता है। इसी कारण ‘विकास-दिशा’ पुस्तक के लोकार्पण और ‘गिरमिटिया’ नाटक के मंचन को कार्यक्रम में स्थान दिया गया है। इससे अकादमिक विमर्श को रचनात्मक अभिव्यक्ति से जोड़ने का अवसर मिलेगा। संस्था की ओर से देश-विदेश के शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, शिक्षकों, शोधार्थियों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, साहित्यकारों तथा भारतीय प्रवासी समुदाय से जुड़े प्रतिनिधियों से आयोजन में सहभागिता का आग्रह किया गया है। आयोजकों की दृष्टि में इस कार्यक्रम की सफलता केवल प्रतिभागियों की संख्या से नहीं, बल्कि इससे उत्पन्न होने वाले ज्ञान-विनिमय और भविष्य के सहयोग की संभावनाओं से भी तय होगी। हैदराबाद में आयोजित होने वाला यह कार्यक्रम ग्वालियर की सामाजिक संस्था और देश के प्रतिष्ठित अकादमिक संस्थानों के बीच सहयोग का उदाहरण भी प्रस्तुत करता है। यह सहयोग भविष्य में भारतीय प्रवासी अध्ययन, सामाजिक शोध और सामुदायिक संवाद से जुड़े अन्य प्रयासों के लिए आधार तैयार कर सकता है।
‘विकास-दिशा’ पुस्तक का लोकार्पण और ‘गिरमिटिया’ नाटक बनेगा विशेष आकर्षण
अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के अकादमिक वातावरण के साथ साहित्य और रंगमंच को जोड़ने के उद्देश्य से कार्यक्रम में डॉ. सुधांशु कुमार चक्रवर्ती द्वारा लिखित पुस्तक ‘विकास-दिशा’ का लोकार्पण किया जाएगा। आयोजन के पोस्टर में पुस्तक को शिक्षा, संस्कृति और समाज के विविध आयामों से संबंधित चिंतन और विकास के व्यापक संदर्भ से जोड़ा गया है। पुस्तक लोकार्पण का कार्यक्रम सेमिनार की बौद्धिक गतिविधियों के बीच साहित्यिक संवाद का अवसर प्रदान करेगा। किसी भी सामाजिक विषय को समझने में साहित्य की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि साहित्य समाज के अनुभवों, विचारों और संवेदनाओं को अलग तरीके से अभिव्यक्त करता है। ‘विकास-दिशा’ के माध्यम से शिक्षा, संस्कृति और समाज के विविध पहलुओं पर विचार प्रस्तुत किए जाने की जानकारी आयोजन सामग्री में दी गई है। पुस्तक का लोकार्पण ऐसे अवसर पर किया जा रहा है, जब देश-विदेश से आए शिक्षाविद और सामाजिक क्षेत्र के प्रतिनिधि एक ही मंच पर मौजूद होंगे। इससे पुस्तक से जुड़े विचारों को व्यापक पाठक और अकादमिक समुदाय तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है। कार्यक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आकर्षण ‘गिरमिटिया’ नाटक है। आयोजन पोस्टर के अनुसार यह प्रवासी मजदूरों की यथार्थपरक कथा पर आधारित नाट्य प्रस्तुति है, जिसका लेखन, निर्देशन एवं अभिनय डॉ. सुधांशु कुमार चक्रवर्ती द्वारा किया जाएगा। भारतीय इतिहास और प्रवासन के संदर्भ में गिरमिटिया श्रमिकों का अध्याय सामाजिक एवं मानवीय दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा है। नाट्य माध्यम के जरिए इस विषय को प्रस्तुत करने से दर्शकों को इतिहास और मानवीय अनुभवों को भावनात्मक एवं रचनात्मक दृष्टि से समझने का अवसर मिलेगा। साहित्य और रंगमंच की यही विशेषता है कि वे किसी विषय को केवल जानकारी के रूप में नहीं, बल्कि अनुभव और संवेदना के रूप में सामने ला सकते हैं। ‘गिरमिटिया’ की प्रस्तुति अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के मुख्य विषय—प्रवासन और परिवार—से भी एक व्यापक ऐतिहासिक एवं सामाजिक संदर्भ में जुड़ती दिखाई देती है। प्रवासन केवल आधुनिक दौर की घटना नहीं है; भारतीय समाज के इतिहास में विभिन्न परिस्थितियों में लोगों के देश-विदेश जाने की लंबी परंपरा रही है। प्रवासी श्रमिकों का अनुभव, उनकी सामाजिक स्थिति, परिवार और संस्कृति से संबंध तथा नए परिवेश में जीवन की चुनौतियां आज भी अध्ययन का विषय हैं। नाटक इस ऐतिहासिक अनुभव को रचनात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से दर्शकों तक पहुंचाने का प्रयास करेगा। आयोजन में साहित्य, संस्कृति और सामाजिक शोध के इस समन्वय से कार्यक्रम का स्वरूप अधिक व्यापक बनेगा। प्रतिभागियों को जहां एक ओर विशेषज्ञों के व्याख्यान और शोध-पत्र सुनने का अवसर मिलेगा, वहीं दूसरी ओर पुस्तक और नाट्य प्रस्तुति के माध्यम से सामाजिक विषयों को रचनात्मक दृष्टि से देखने का अवसर भी प्राप्त होगा। इस तरह कार्यक्रम ज्ञान और कला के बीच संवाद स्थापित करने की दिशा में एक सार्थक पहल के रूप में सामने आएगा।
वैश्विक भारतीय समुदाय, संस्कृति और सामाजिक संवाद को मिलेगा मंच
कार्यक्रम के पोस्टर में “सिक्किम—संस्कृति, शांति और सौंदर्य की धरती” को भी विशेष रूप से स्थान दिया गया है। सिक्किम की प्राकृतिक सुंदरता, पर्वतीय परंपराएं, सांस्कृतिक विविधता और सामाजिक सौहार्द को भारतीय बहुलता के एक महत्वपूर्ण पक्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है। आयोजन में भारतीय संस्कृति के विभिन्न रूपों को सम्मान देने की भावना भी दिखाई देती है। भारत की सांस्कृतिक पहचान केवल एक क्षेत्र या परंपरा तक सीमित नहीं है, बल्कि विभिन्न राज्यों, भाषाओं, लोक परंपराओं और समुदायों के सम्मिलित अनुभवों से निर्मित होती है। प्रवासी भारतीय जब विदेशों में रहते हैं, तब वे अक्सर अपनी मूल संस्कृति के साथ नए समाज की संस्कृति का भी अनुभव करते हैं। इस सांस्कृतिक संवाद से एक नई सामाजिक पहचान का निर्माण होता है। सेमिनार का विषय इसी संक्रमण और परिवर्तन को समझने का अवसर प्रदान करता है। भारतीय प्रवासी परिवारों की नई पीढ़ी के लिए भाषा, संस्कृति, परंपरा और आधुनिक जीवनशैली के बीच संतुलन का प्रश्न महत्वपूर्ण हो सकता है। डिजिटल माध्यमों ने इस संबंध को और नया आयाम दिया है। आज विदेशों में रहने वाले परिवार भारत में अपने रिश्तेदारों से निरंतर संपर्क में रह सकते हैं, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में ऑनलाइन भाग ले सकते हैं और अपनी भाषा एवं परंपराओं से जुड़े रह सकते हैं। दूसरी ओर स्थानीय समाज और जीवनशैली का प्रभाव भी उनके पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवहार में दिखाई देता है। इस दोतरफा सांस्कृतिक प्रक्रिया पर अकादमिक विमर्श आवश्यक है। कार्यक्रम में सांस्कृतिक संवाद, प्रवासी अध्ययन, परिवार और सामाजिक परिवर्तन जैसे विषयों को भी प्रमुखता दी गई है। इसी संदर्भ में शिक्षा की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। शिक्षा न केवल रोजगार का माध्यम है, बल्कि यह व्यक्ति की सामाजिक और सांस्कृतिक समझ का निर्माण करती है। प्रवासी परिवारों में बच्चों की शिक्षा के साथ उनकी सांस्कृतिक पहचान और पारिवारिक मूल्यों का संबंध भी अध्ययन का विषय बन सकता है। महिलाओं की भूमिका और सशक्तिकरण भी प्रवासी परिवारों की सामाजिक संरचना को समझने का महत्वपूर्ण आयाम है। बदलते आर्थिक और सामाजिक परिवेश में महिलाओं की शिक्षा, रोजगार, नेतृत्व और निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी परिवार की संरचना और कल्याण को प्रभावित करती है। सेमिनार में ऐसे विषयों पर विचार-विमर्श से व्यापक दृष्टिकोण सामने आने की उम्मीद है। आयोजकों की योजना अकादमिक शोध को सामाजिक अनुभवों से जोड़ने की है, ताकि नीति निर्माण और सामाजिक हस्तक्षेप के लिए उपयोगी विचार विकसित हो सकें। प्रवासी परिवारों से जुड़े नीतिगत प्रश्नों में शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, परिवार कल्याण, महिला सशक्तिकरण और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे विषयों पर विचार किया जा सकता है। विभिन्न देशों में भारतीय समुदाय की अलग-अलग परिस्थितियों को समझने के लिए तुलनात्मक दृष्टिकोण भी उपयोगी होगा। यही कारण है कि आयोजन में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सहभागिता को महत्व दिया गया है। हैदराबाद जैसे बहुसांस्कृतिक और ऐतिहासिक शहर में यह कार्यक्रम भारतीय संस्कृति और वैश्विक प्रवासी अनुभवों के बीच संवाद का उपयुक्त मंच बन सकता है।
ग्लोबल सुपर-30 अवार्ड से उल्लेखनीय योगदानों को सम्मान, शोध-संवाद से भविष्य की नई संभावनाएं
अंतरराष्ट्रीय सेमिनार के साथ आयोजित होने वाला ग्लोबल सुपर-30 अवार्ड-2026 कार्यक्रम का दूसरा प्रमुख आकर्षण होगा। आयोजन की अवधारणा के अनुसार विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान देने वाले चयनित व्यक्तित्वों को सम्मानित किया जाएगा। शिक्षा, शोध, सामाजिक सेवा, साहित्य, संस्कृति, नेतृत्व तथा अन्य रचनात्मक एवं सामाजिक क्षेत्रों में कार्य करने वाली प्रतिभाओं को पहचान और प्रोत्साहन देने का उद्देश्य इस सम्मान से जुड़ा है। समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए काम करने वाले व्यक्तियों को सार्वजनिक रूप से सम्मानित करने से उनके कार्य को व्यापक पहचान मिलती है और अन्य लोगों को भी प्रेरणा मिलती है। ‘ग्लोबल सुपर-30’ नाम के अनुरूप विभिन्न क्षेत्रों से चयनित प्रतिभाओं को एक मंच पर सम्मानित किया जाना कार्यक्रम को विशेष स्वरूप देगा। सम्मान समारोह और अंतरराष्ट्रीय सेमिनार का एक साथ आयोजन यह संदेश देता है कि ज्ञान और सामाजिक योगदान दोनों समाज की प्रगति के महत्वपूर्ण आधार हैं। एक ओर शोधकर्ता और शिक्षाविद अपने विचार प्रस्तुत करेंगे, वहीं दूसरी ओर विभिन्न क्षेत्रों में कार्य कर रहे व्यक्तित्वों की उपलब्धियों को सम्मान मिलेगा। कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से प्रतिभागियों के साथ विदेशों से भी शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं और प्रवासी समुदाय से जुड़े प्रतिनिधियों की सहभागिता की संभावना है। इससे भारतीय प्रवासी परिवारों के विषय पर स्थानीय और वैश्विक अनुभवों का आदान-प्रदान हो सकेगा। सेमिनार में प्रस्तुत शोध-पत्र और विशेषज्ञ विचार भविष्य में शोध सहयोग की संभावनाएं भी विकसित कर सकते हैं। विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों के बीच संपर्क बढ़ने से संयुक्त शोध, अकादमिक संवाद और ज्ञान-विनिमय को प्रोत्साहन मिल सकता है। युवा शोधार्थियों के लिए वरिष्ठ शिक्षाविदों से संवाद का अवसर उनके अकादमिक विकास में उपयोगी हो सकता है। इसी प्रकार सामाजिक कार्यकर्ताओं और प्रवासी समुदाय के प्रतिनिधियों की सहभागिता शोध को जमीनी अनुभवों से जोड़ सकती है। आयोजन की यही विशेषता इसे केवल औपचारिक अकादमिक सम्मेलन से आगे ले जाती है। ज्ञान, शोध, संस्कृति, सामाजिक संवाद और वैश्विक साझेदारी इसके व्यापक आधार के रूप में सामने आते हैं। कार्यक्रम का आयोजन हैदराबाद विश्वविद्यालय परिसर में होने के कारण प्रतिभागियों को प्रतिष्ठित शैक्षणिक वातावरण में विचार-विमर्श का अवसर मिलेगा। आयोजकों द्वारा देश-विदेश के इच्छुक प्रतिभागियों से समय पर पंजीयन और सहभागिता का आग्रह किया गया है। बाहर से आने वाले पूर्व-पंजीकृत प्रतिभागियों और अतिथियों के लिए संस्थागत उपलब्धता एवं व्यवस्था के आधार पर विश्वविद्यालय परिसर में आवास की व्यवस्था का प्रयास किए जाने की जानकारी भी दी गई है। आयोजन का समापन केवल सम्मान और प्रस्तुतियों तक सीमित न रहकर भविष्य के संवाद और सहयोग की दिशा में आगे बढ़ने की संभावना के साथ होगा। भारतीय प्रवासी परिवारों के बदलते सामाजिक और पारिवारिक परिदृश्य को समझना आने वाले समय में भी महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि वैश्विक स्तर पर भारतीय समुदाय की भूमिका लगातार विस्तृत हो रही है। ऐसे में शोध, नीति और समाज के बीच संवाद आवश्यक है। 18 सितंबर को हैदराबाद विश्वविद्यालय में होने वाला ग्लोबल सुपर-30 अवार्ड एवं अंतरराष्ट्रीय सेमिनार-2026 इसी संवाद को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। कार्यक्रम के माध्यम से भारतीय प्रवासी परिवारों की वास्तविकताओं, उनके सामने मौजूद चुनौतियों, उनके योगदान और भविष्य की संभावनाओं पर गंभीर चर्चा का अवसर मिलेगा। साहित्यिक प्रस्तुति, पुस्तक लोकार्पण और सांस्कृतिक तत्व आयोजन को मानवीय एवं रचनात्मक आयाम प्रदान करेंगे, जबकि अकादमिक सत्र विषय को शोधपरक आधार देंगे। इस समन्वित प्रयास से प्रतिभागियों को एक ऐसा मंच प्राप्त होगा, जहां वे अनुभव साझा करने के साथ नए विचारों और सहयोग की संभावनाओं पर भी विचार कर सकेंगे। आयोजकों की व्यापक अपेक्षा यही है कि यह कार्यक्रम भारतीय प्रवासी अध्ययन, सामाजिक शोध और पारिवारिक कल्याण से जुड़े विमर्श को नई दिशा देने में सहायक बने तथा शिक्षा, शोध, संस्कृति और सामाजिक सहभागिता के बीच स्थायी संवाद को और मजबूत करे।
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