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इनायत, मोहब्बत और तहज़ीब के बदलते मायनों पर गहरी बात कहती रचना, रिश्तों में सच्चाई और इंसानियत की तलाश का संदेश

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समाज में बढ़ती औपचारिकता, स्वार्थ और दिखावे के बीच सच्चे प्रेम, अपनत्व, मुरव्वत और संस्कारों की अहमियत को रेखांकित करती पंक्तियां; सच की पैरवी और नई पीढ़ी तक तहज़ीब पहुंचाने का भाव उभरता है
प्रस्तुत रचना आज के सामाजिक जीवन में बदलते रिश्तों, भावनाओं और मानवीय मूल्यों की ओर गंभीरता से ध्यान आकर्षित करती है। कविता की शुरुआत ही एक ऐसे प्रश्न से होती है, जिसमें “इनायत” और “मोहब्बत” के बीच का अंतर सामने आता है। जीवन में किसी पर कृपा करना, सहानुभूति जताना या औपचारिक रूप से मदद कर देना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है, लेकिन बिना किसी स्वार्थ के किसी को सच्चे मन से चाहना और उसके सुख-दुख में साथ खड़ा रहना कहीं अधिक कठिन है। रचना इसी अंतर को आधार बनाकर वर्तमान समय के रिश्तों की पड़ताल करती दिखाई देती है। “चिराग़ों की हवा से अब हिफ़ाज़त कौन करता है” जैसे भाव के माध्यम से यह संकेत मिलता है कि किसी रिश्ते, उम्मीद या विश्वास को कठिन परिस्थितियों से बचाकर बनाए रखना निरंतर प्रयास मांगता है। आज के तेज़ी से बदलते सामाजिक परिवेश में जहां संवाद के साधन बढ़े हैं, वहीं आत्मीय संवाद की कमी भी महसूस की जाती है। लोग एक-दूसरे के संपर्क में तो रहते हैं, लेकिन हर संपर्क के पीछे संवेदना और आत्मीयता हो, यह जरूरी नहीं। कविता इसी विडंबना को सहज लेकिन प्रभावशाली ढंग से सामने रखती है। आगे रचना में समय की उस रवायत पर प्रश्न उठाया गया है जिसमें हमदर्दी अक्सर केवल शब्दों तक सीमित रह जाती है। किसी के दुख को सुन लेना और वास्तव में उसके दर्द को समझकर उसके साथ खड़ा होना दो अलग बातें हैं। किसी दूसरे के लिए समय निकालना, उसके संघर्ष में सहभागी बनना और बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के सहायता करना आज भी मानवीयता की पहचान है। रचना इस बात को रेखांकित करती है कि समाज में वास्तविक बदलाव केवल बड़े शब्दों से नहीं, बल्कि व्यवहार में दिखाई देने वाली संवेदनशीलता से आता है। किसी के प्रति सच्ची मोहब्बत, सम्मान और सहानुभूति तभी सार्थक होती है जब वह कठिन समय में भी कायम रहे। इसी क्रम में कविता रिश्तों की मजबूती को नींव के रूपक से जोड़ती है। मकान की मजबूती उसकी बाहरी सजावट से नहीं, बल्कि उसकी नींव की मजबूती से तय होती है। उसी प्रकार परिवार, मित्रता और सामाजिक संबंध भी केवल अच्छे शब्दों या दिखावे से मजबूत नहीं होते, बल्कि विश्वास, त्याग, धैर्य और जिम्मेदारी की नींव पर टिके रहते हैं। जब किसी के इरादे कठिन समय में डगमगाते हैं, तब रिश्तों की वास्तविक परीक्षा होती है। सुख के समय साथ रहना आसान है, लेकिन विपरीत परिस्थितियों में किसी का हाथ थामे रखना रिश्ते की असली पहचान बनता है। रचना इसी मानवीय कसौटी को सामने रखते हुए पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। इसमें किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप नहीं लगाया गया, बल्कि व्यापक सामाजिक प्रवृत्ति पर सवाल खड़ा किया गया है कि क्या आज भी हम दूसरों के लिए उतनी ही ईमानदारी, संवेदना और जिम्मेदारी रखते हैं, जितनी अपने लिए चाहते हैं। यह प्रश्न केवल परिवार तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक स्तर पर लागू होता है।
रिश्तों की वास्तविक पहचान कठिन समय में होती है, शब्दों से अधिक व्यवहार और जिम्मेदारी को महत्व देने का संदेश। रचना का अगला पक्ष उन परिस्थितियों को सामने लाता है जब किसी व्यक्ति के पास पहले से ही दुख और जिम्मेदारियों का बोझ हो और उसके सामने सहायता की अपेक्षाएं लगातार आती रहें। “लदा हो बोझ कर्ज़े का, मुरव्वत कौन करता है” जैसे भाव जीवन की व्यावहारिक कठिनाइयों और मानवीय संबंधों के बीच पैदा होने वाले तनाव को व्यक्त करते हैं। कर्ज केवल आर्थिक स्थिति का प्रतीक नहीं है; यह जिम्मेदारियों, परेशानियों, अपेक्षाओं और मानसिक दबाव का भी रूपक बन सकता है। जब व्यक्ति स्वयं कठिन दौर से गुजर रहा हो, तब भी दूसरों की मदद करने की इच्छा रखना मानवीयता का परिचायक है, लेकिन हर व्यक्ति की अपनी सीमाएं और परिस्थितियां होती हैं। कविता इसी जटिलता को सवालों के माध्यम से सामने रखती है। इसमें “मुरव्वत” शब्द विशेष महत्व रखता है, जिसका अर्थ केवल औपचारिक शिष्टाचार नहीं बल्कि किसी के प्रति लिहाज, सहृदयता और मानवीय व्यवहार से जुड़ा है। आज के सामाजिक जीवन में कई बार संबंध आवश्यकता के आधार पर परिभाषित होने लगते हैं। जब जरूरत होती है तब किसी की याद आती है, काम पूरा होने के बाद दूरी बढ़ जाती है। रचना इस व्यवहार पर भी प्रश्न उठाती है। इसके बाद कविता सच और झूठ के बीच बदलते सामाजिक समीकरण की ओर बढ़ती है। “सबूतों की बदौलत आज झूठा सच बना देखो” जैसी पंक्ति वर्तमान समय में सूचना, प्रमाण और धारणा के बीच के संबंध पर गंभीर सवाल खड़ा करती है। किसी बात को प्रमाणित करने के लिए सबूत आवश्यक होते हैं, लेकिन केवल प्रस्तुत किए गए प्रमाणों के आधार पर सत्य की पूरी तस्वीर सामने आ जाए, यह हमेशा जरूरी नहीं। सच की वास्तविक वकालत वही कर सकता है जो परिस्थिति, तथ्य और न्याय को निष्पक्ष दृष्टि से देखे। कविता का भाव यह है कि जब सत्य की जगह सुविधा, पक्षधरता या दिखावे को महत्व मिलने लगे, तब समाज के सामने एक गंभीर चुनौती पैदा होती है। सच का साथ देना कई बार कठिन होता है, क्योंकि इसके लिए व्यक्तिगत लाभ या लोकप्रियता से ऊपर उठकर सही बात के पक्ष में खड़ा होना पड़ता है। रचना इसी साहस की आवश्यकता को रेखांकित करती है। यह किसी विवाद या आरोप को जन्म देने के बजाय पाठक के भीतर यह प्रश्न पैदा करती है कि हम अपने दैनिक जीवन में सत्य को कितना महत्व देते हैं। क्या हम किसी बात को केवल इसलिए सच मान लेते हैं क्योंकि उसके समर्थन में कुछ प्रमाण प्रस्तुत कर दिए गए हैं, या फिर हम पूरे संदर्भ को समझने का प्रयास भी करते हैं? इसी प्रकार कविता में यह भी कहा गया है कि किसी की याद कई बार आवश्यकता के समय ही आती है। यह अनुभव आज के सामाजिक संबंधों में आम दिखाई देता है, जहां कई रिश्तों में संवाद का आधार आत्मीयता के बजाय आवश्यकता बन जाता है। सूरज निकलने के बाद जुगनू की जरूरत कम महसूस होना इसी भाव का प्रतीक है। कठिन समय में छोटे से सहारे का महत्व बहुत बढ़ जाता है, जबकि सुविधा और सफलता के समय वही सहारा महत्वहीन समझ लिया जाता है। रचना इस मानसिकता को लेकर पाठक को सोचने के लिए प्रेरित करती है कि क्या रिश्ते केवल आवश्यकता के समय याद किए जाने के लिए हैं, या उनका उद्देश्य एक-दूसरे की मौजूदगी को हर परिस्थिति में महत्व देना भी है। सच्चे रिश्ते वही होते हैं जिनमें व्यक्ति की उपयोगिता नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत और उपस्थिति महत्वपूर्ण होती है। कविता का यह पक्ष सामाजिक जीवन में स्थायी संबंधों की जरूरत को सामने रखता है और बताता है कि संबंधों की मजबूती निरंतर संवाद, सम्मान और संवेदनशीलता से बनी रहती है।
शिकायतों के ऊंचे स्वर के बीच प्रेमपूर्ण संवाद की आवश्यकता, रिश्तों को बचाने के लिए संवेदनशील भाषा और धैर्य को बताया गया महत्वपूर्ण आधार। रचना का एक महत्वपूर्ण भाव शिकायत और मोहब्बत के बीच के अंतर से जुड़ा है। जीवन में शिकायतें होना स्वाभाविक है। जहां संबंध होते हैं, वहां अपेक्षाएं भी होती हैं और अपेक्षाओं के पूरे न होने पर मन में नाराजगी या दुख पैदा हो सकता है। लेकिन शिकायत व्यक्त करने का तरीका रिश्ते की दिशा तय कर सकता है। यदि संवाद का स्वर हमेशा ऊंचा हो, आरोपों से भरा हो और सामने वाले को समझने की कोशिश न की जाए, तो धीरे-धीरे रिश्तों में दूरी बढ़ सकती है। इसके विपरीत यदि शिकायत के साथ प्रेम, सम्मान और संवाद बना रहे तो कठिन परिस्थितियों में भी संबंधों को संभाला जा सकता है। कविता इसी अंतर को सामने रखती है और यह सवाल करती है कि जब शिकायतों की भाषा इतनी तीखी हो जाए तो प्रेम के साथ शिकायत करने की गुंजाइश कितनी बचती है। यहां “मोहब्बत” केवल प्रेम संबंधों तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक अर्थ परिवार, मित्रता, पड़ोस, समाज और मनुष्य के प्रति मनुष्य की संवेदना से है। प्रेम का अर्थ केवल भावनात्मक लगाव नहीं बल्कि दूसरे की परिस्थितियों को समझना, उसकी सीमाओं का सम्मान करना और जरूरत पड़ने पर उसके साथ खड़ा होना भी है। रचना का अगला महत्वपूर्ण पक्ष “जायदाद” और “तहज़ीब” के अंतर को सामने लाता है। आज परिवारों में संपत्ति, जमीन, मकान और आर्थिक संसाधनों के बंटवारे के लिए दस्तावेज तैयार किए जाते हैं। संपत्ति की सुरक्षा और उत्तराधिकार की कानूनी व्यवस्था समाज के लिए आवश्यक है, लेकिन कविता एक बड़ा मानवीय प्रश्न पूछती है कि क्या आने वाली पीढ़ी के लिए तहज़ीब और संस्कार की भी कोई वसीयत तैयार की जाती है? यही इस रचना का सबसे व्यापक सामाजिक संदेश बनकर सामने आता है। भौतिक संपत्ति आने वाली पीढ़ी को सुविधाएं दे सकती है, लेकिन संस्कार उसे उन सुविधाओं का सही उपयोग करना सिखाते हैं। परिवार की वास्तविक विरासत केवल मकान, जमीन या धन नहीं होती, बल्कि व्यवहार, भाषा, बड़ों का सम्मान, छोटों के प्रति स्नेह, जरूरतमंदों के प्रति संवेदना, मेहनत का मूल्य, ईमानदारी और जिम्मेदारी की भावना भी होती है। यदि आने वाली पीढ़ी को आर्थिक संसाधन तो मिल जाएं लेकिन मानवीय मूल्यों की समझ न मिले, तो सामाजिक विकास अधूरा रह सकता है। कविता इसलिए संपत्ति की वसीयत के साथ तहज़ीब की वसीयत की बात करती है। यह संदेश आज के समय में विशेष रूप से प्रासंगिक दिखाई देता है, क्योंकि तेजी से बदलते जीवन में परिवारों की संरचना, संवाद के तरीके और सामाजिक व्यवहार में भी बदलाव आ रहा है। नई पीढ़ी को आधुनिक शिक्षा, तकनीक और अवसरों के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं से जोड़ना भी आवश्यक है। तहज़ीब का अर्थ केवल परंपरागत तौर-तरीकों का पालन करना नहीं, बल्कि परिस्थितियों के अनुसार सम्मानजनक, जिम्मेदार और संवेदनशील व्यवहार करना है। यही कारण है कि कविता का यह हिस्सा व्यक्तिगत जीवन से आगे बढ़कर समाज और आने वाले समय की चिंता से जुड़ जाता है। परिवार यदि बच्चों को केवल सफलता प्राप्त करने की शिक्षा देगा और उन्हें संवेदना, धैर्य, सहयोग तथा सत्यनिष्ठा का महत्व नहीं बताएगा तो सामाजिक संतुलन प्रभावित हो सकता है। इसलिए रचना के माध्यम से यह विचार सामने आता है कि भौतिक संपदा के साथ नैतिक संपदा को भी अगली पीढ़ी तक पहुंचाना जरूरी है। यह नैतिक संपदा किसी दस्तावेज में दर्ज नहीं होती, बल्कि परिवार के व्यवहार, बड़ों के आचरण और रोजमर्रा की छोटी-छोटी घटनाओं के माध्यम से बच्चों तक पहुंचती है। इसी अर्थ में कविता सामाजिक जिम्मेदारी का भी संदेश देती है।
सच की वकालत, आत्मीय रिश्तों की तलाश और दिखावे से आगे बढ़कर मानवीय मूल्यों को महत्व देने की जरूरत। रचना में बार-बार उठाए गए प्रश्न पाठक को यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि वर्तमान सामाजिक जीवन में हम किन मूल्यों को प्राथमिकता दे रहे हैं। इनायत, मोहब्बत, हमदर्दी, मुरव्वत, सच, शिकायत और तहज़ीब जैसे शब्द कविता के अलग-अलग हिस्सों में आते हैं, लेकिन इन सभी का मूल संबंध मानवीय व्यवहार से है। यही कारण है कि पूरी रचना को केवल व्यक्तिगत भावनाओं की अभिव्यक्ति के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसमें सामाजिक जीवन के अनेक पहलुओं की झलक मिलती है। रिश्तों में औपचारिकता बढ़ने पर आत्मीयता कम हो सकती है। जरूरत के समय ही किसी को याद करना संबंधों को उपयोगिता तक सीमित कर सकता है। कठिन समय में साथ छोड़ देना विश्वास को कमजोर कर सकता है। ऊंचे स्वर में शिकायत करना संवाद की संभावना को कम कर सकता है। वहीं सच की जगह सुविधा को प्राथमिकता देना सामाजिक विश्वास को प्रभावित कर सकता है। इन सभी स्थितियों के बीच कविता एक वैकल्पिक रास्ता सुझाती है—मानवीयता का। इसका आशय यह नहीं कि जीवन की सभी समस्याएं केवल भावनाओं से हल हो सकती हैं, बल्कि यह कि किसी भी सामाजिक व्यवस्था की मजबूती के लिए संवेदनशीलता और नैतिकता आवश्यक है। परिवार हो या समाज, संस्था हो या कार्यस्थल, हर जगह विश्वास और निष्पक्षता का महत्व रहता है। यदि व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को केवल अपने लाभ के संदर्भ में देखेगा तो रिश्तों में स्थायित्व कम होगा। इसके विपरीत यदि संबंधों में परस्पर सम्मान और सहयोग रहेगा तो कठिन परिस्थितियों का सामना करना भी आसान होगा। कविता में सच की वकालत का भाव भी इसी व्यापक नैतिक दृष्टिकोण का हिस्सा है। सत्य का समर्थन करने के लिए साहस और निष्पक्षता दोनों की आवश्यकता होती है। कई बार सच हमारे पक्ष में नहीं होता, फिर भी उसे स्वीकार करना ही ईमानदारी है। समाज में सत्य की प्रतिष्ठा तभी बनी रह सकती है जब लोग सुविधा के अनुसार सत्य का अर्थ बदलने के बजाय तथ्य और न्याय के आधार पर अपनी भूमिका तय करें। इसी प्रकार तहज़ीब का प्रश्न भी सत्य और मानवीयता से जुड़ता है। संस्कार का वास्तविक अर्थ केवल अभिवादन या औपचारिक शिष्टाचार नहीं, बल्कि उस समय सही व्यवहार करना है जब कोई देख भी नहीं रहा हो। किसी जरूरतमंद की मदद करना, कमजोर व्यक्ति के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना, बुजुर्गों की बात सुनना, बच्चों को समय देना, महिलाओं और पुरुषों सभी के प्रति सम्मान बनाए रखना, सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी निभाना और मतभेद के बावजूद संवाद कायम रखना—ये सभी तहज़ीब के व्यापक रूप हैं। कविता की विशेषता यह है कि वह इन बातों को उपदेश की तरह नहीं रखती, बल्कि प्रश्नों के माध्यम से पाठक को स्वयं उत्तर खोजने का अवसर देती है। यही शैली रचना को चिंतनपरक बनाती है। हर शेर के भीतर एक सवाल है और हर सवाल के पीछे जीवन का कोई अनुभव दिखाई देता है। पाठक इन सवालों को अपने जीवन, अपने रिश्तों और अपने सामाजिक व्यवहार से जोड़ सकता है। इस दृष्टि से रचना केवल भावनात्मक नहीं बल्कि आत्ममंथन की रचना भी बन जाती है। इसमें यह आग्रह छिपा है कि यदि हम चाहते हैं कि समाज में भरोसा, प्रेम और सहयोग कायम रहे तो इसकी शुरुआत हमें अपने व्यवहार से करनी होगी। दूसरों से सच्चाई, सम्मान और संवेदना की अपेक्षा करने से पहले हमें स्वयं भी वही मूल्य अपनाने होंगे।
अंधेरे बंद कमरों और रोशनी की तलाश का रूपक, जीवन में संवाद, उम्मीद और खुलेपन की आवश्यकता को करता है रेखांकित। रचना का अंतिम भाव “अंधेरे बंद कमरों” के रूपक के माध्यम से सामने आता है। अंधेरा केवल प्रकाश की अनुपस्थिति नहीं बल्कि कई बार अकेलेपन, संवादहीनता, निराशा या सामाजिक दूरी का प्रतीक भी हो सकता है। बंद कमरा उस स्थिति को दर्शा सकता है जिसमें व्यक्ति स्वयं को दुनिया से अलग कर लेता है या जहां उसकी आवाज दूसरों तक नहीं पहुंचती। ऐसे वातावरण में बाहर से मिलने वाली इनायत या कृपा की उम्मीद करना कठिन हो सकता है। इसीलिए अंतिम पंक्तियां पूरे काव्य भाव को एक गहरे आत्ममंथन के साथ समाप्त करती हैं। कविता की शुरुआत जहां इनायत और मोहब्बत के अंतर से होती है, वहीं अंत में वह फिर इनायत और अंधेरे के संबंध को सामने लाती है। इस तरह रचना एक वृत्त की तरह अपने आरंभिक भाव की ओर लौटती है। बीच के सभी शेरों में रिश्तों, सत्य, जरूरत, शिकायत, संपत्ति और तहज़ीब के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं पर सवाल उठाए जाते हैं और अंत में पाठक को यह सोचने के लिए छोड़ दिया जाता है कि रोशनी किसे कहते हैं और उसे बनाए रखने की जिम्मेदारी किसकी है। समाज में सकारात्मकता केवल बाहर से नहीं आती। परिवारों में संवाद, मित्रों में विश्वास, पड़ोस में सहयोग, संस्थाओं में पारदर्शिता और सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदारी—ये सभी मिलकर सामाजिक रोशनी का निर्माण करते हैं। यदि व्यक्ति अपने आसपास के लोगों के प्रति संवेदनशील हो तो अकेलापन कम हो सकता है। यदि शिकायत की जगह संवाद हो तो रिश्ते बच सकते हैं। यदि स्वार्थ की जगह सहयोग हो तो समुदाय मजबूत हो सकता है। यदि झूठ की जगह सच का साथ दिया जाए तो विश्वास कायम रह सकता है। और यदि संपत्ति के साथ तहज़ीब की विरासत भी अगली पीढ़ी को दी जाए तो समाज का भविष्य अधिक संतुलित हो सकता है। रचना का संदेश इसी व्यापक मानवीय दृष्टि से जुड़ता है। इसमें जीवन की कठिनाइयों को नकारा नहीं गया है, बल्कि यह स्वीकार किया गया है कि कठिनाइयां हमेशा रहेंगी और उनकी वास्तविक परीक्षा हमारे व्यवहार से होगी। किसी के जीवन में संकट आए तो हम कितना साथ देते हैं, किसी के पास साधन न हों तो हम कितना सहयोग करते हैं, किसी पर आरोप लगे तो हम बिना पूरी बात जाने कितना निर्णय सुनाते हैं, किसी रिश्ते में शिकायत हो तो हम संवाद का रास्ता कितना खुला रखते हैं और आने वाली पीढ़ी को हम केवल संपत्ति देते हैं या संस्कार भी—ये सभी प्रश्न आज के समाज के सामने मौजूद हैं। कविता का महत्व इस बात में है कि वह इन प्रश्नों को सीधे और सरल भाषा में सामने लाती है। इसमें भावनात्मकता के साथ सामाजिक निरीक्षण भी है और व्यक्तिगत अनुभव के साथ व्यापक मानवीय चिंता भी। रचना यह याद दिलाती है कि दुनिया को बदलने के लिए हमेशा बड़े कदम जरूरी नहीं होते; कई बार किसी की बात ध्यान से सुन लेना, जरूरत के समय साथ खड़े रहना, गलत बात के सामने सच बोलना, नाराजगी में भी सम्मान बनाए रखना और बच्चों को अच्छे व्यवहार का उदाहरण देना ही पर्याप्त शुरुआत हो सकती है। इनायत बांटना आसान हो सकता है, लेकिन मोहब्बत निभाना जिम्मेदारी मांगता है। शब्दों में हमदर्दी जताना सरल हो सकता है, लेकिन किसी के संघर्ष में साथ देना वास्तविक संवेदना की पहचान है। संपत्ति छोड़ जाना संभव है, लेकिन तहज़ीब की विरासत छोड़ने के लिए जीवनभर अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करना पड़ता है। यही इस रचना का केंद्रीय संदेश है कि मनुष्य की वास्तविक पहचान उसके पास मौजूद संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके व्यवहार, सत्य के प्रति निष्ठा, रिश्तों के प्रति जिम्मेदारी और दूसरों के प्रति संवेदना से होती है।
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