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कौन किस तरफ़ खड़ा है इस लड़ाई में

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वक़्त, सच और समाज के बीच खिंची अदृश्य रेखाएँ

समय केवल घड़ी की सुइयों में नहीं चलता, वह समाज की नसों में बहता है। वह चुपचाप देखता है, परखता है और फिर एक दिन अपने निर्णय सुना देता है। आज का समय भी कुछ ऐसा ही कर रहा है—वह उतरकर बहुत गहराई में देख रहा है कि इस व्यापक, बहुआयामी और लगातार चल रही लड़ाई में कौन किस तरफ़ खड़ा है। यह लड़ाई किसी एक व्यक्ति, दल या विचार की नहीं है, बल्कि यह संघर्ष है सच और असत्य के बीच, प्रकाश और अंधकार के बीच, साहस और सुविधावाद के बीच।

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प्रख्यात कवि संजीव जैन की पंक्तियाँ—

“वक़्त उतरकर देखता है बहुत गहराई में,

कौन किस तरफ़ खड़ा है इस लड़ाई में।”

आज के सामाजिक यथार्थ का सबसे सटीक आईना बनकर सामने आती हैं। यह पंक्ति केवल काव्य नहीं, बल्कि एक चेतावनी है। यह सवाल है, और साथ ही एक भविष्यवाणी भी।

 

सूरज के सामने दिये और व्यवस्था की बिसात

 

जब व्यवस्था स्वयं को सर्वशक्तिमान मानने लगती है, तब छोटे-छोटे सत्य के दीपकों को तुच्छ समझ लिया जाता है। सवाल उठाया जाता है कि सूरज के सामने दिये की बिसात क्या है। लेकिन इतिहास गवाह है कि अंधकार को चुनौती देने का साहस हमेशा छोटे दीपकों ने ही किया है। सत्ता, पूँजी और बहुमत के सूरज अक्सर अपनी चमक में सच्चाई की आँखें चौंधिया देते हैं, पर वही दिये हैं जो सीमित साधनों में भी रोशनी की जिद ज़िंदा रखते हैं।

 

आज की दुनिया में यह प्रश्न और अधिक प्रासंगिक हो गया है। जब झूठ को रणनीति और सच को असुविधा समझा जाने लगा हो, तब रोशनी की जमात में यह तय करना कठिन हो जाता है कि वास्तव में रोशन कौन है और अंधेरे में कौन।

 

अंधेरों से सदियों पुरानी जंग

 

यह कोई नई लड़ाई नहीं है। सदियों से समाज अंधेरों से लड़ता आया है—कभी जाति के नाम पर, कभी धर्म के नाम पर, कभी सत्ता के दमन के रूप में और कभी चुप्पी की साज़िश के रूप में। हर युग में कुछ लोग रहे हैं जो अंधेरे के साथ खड़े होकर उसे ही व्यवस्था का नाम देते रहे, और कुछ वे भी रहे जो छोटे-से जुगनू की तरह चमकते रहे।

 

“जब तक जुगनू ज़िंदा है तो रात क्या है।”

यह पंक्ति केवल आशा नहीं, बल्कि प्रतिरोध का घोषणापत्र है। जुगनू संख्या में कम हो सकते हैं, पर उनका प्रकाश अंधेरे को चुनौती देता है। आज के समय में जुगनू वे लोग हैं जो सवाल पूछते हैं, सच लिखते हैं, अन्याय के विरुद्ध खड़े होते हैं और कीमत चुकाने के बावजूद पीछे नहीं हटते।

 

रात, सितारे और भ्रम का उत्सव

 

अक्सर ऐसा होता है कि अंधकार स्वयं को सजाकर प्रस्तुत करता है। वह सितारों की चादर ओढ़ लेता है, चाँद को अपनी महफ़िल में बुला लेता है और यह भ्रम पैदा करता है कि यही अंतिम सत्य है। सत्ता, प्रचार और प्रलोभन के सहारे रात को दिन साबित करने की कोशिशें की जाती हैं।

 

लेकिन दुनिया जानती है कि सुबह के अपने मायने होते हैं। रात चाहे कितनी ही आकर्षक क्यों न हो, वह रात ही कहलाती है। सच की सुबह देर से आती है, पर आती ज़रूर है। यही कारण है कि समय अंततः निर्णय करता है कि कौन केवल चमकदार अंधकार का हिस्सा था और कौन रोशनी की वास्तविक लड़ाई लड़ रहा था।

 

सच की कीमत और समाज की भलाई

 

सच हमेशा आरामदेह नहीं होता। वह सवाल करता है, असहज करता है और कई बार अकेला छोड़ देता है। लेकिन समाज की भलाई के लिए सच का होना अनिवार्य है। जब सच को दबाया जाता है, तब समाज बीमार होने लगता है। झूठ से बनी व्यवस्था दिखने में मजबूत हो सकती है, पर भीतर से खोखली होती है।

 

आज का समय गवाह है कि सच बोलने वालों को किस तरह हाशिये पर धकेलने की कोशिशें हो रही हैं। उन्हें राष्ट्रद्रोही, उपद्रवी या अवांछनीय कहकर चुप कराने का प्रयास किया जाता है। लेकिन समय की अदालत में यही लोग गवाह बनते हैं कि किसने समाज के हित में खड़ा होकर जोखिम उठाया।

 

वक़्त की सुनवाई और अंतिम फैसला

 

वक़्त की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह सब कुछ दर्ज करता है। वह याद रखता है कि कठिन समय में कौन मौन रहा, कौन सत्ता के साथ खड़ा रहा और कौन सच के साथ। आज भले ही शोर में सच्ची आवाज़ दब जाए, पर इतिहास के पन्नों में वही आवाज़ सबसे स्पष्ट होकर दर्ज होती है।

 

जब समय अपनी सुनवाई पूरी करेगा, तब यह स्पष्ट हो जाएगा कि इस लड़ाई में कौन किस तरफ़ खड़ा था। तब न पद मायने रखेंगे, न प्रचार, न ही तात्कालिक लोकप्रियता। केवल यह देखा जाएगा कि किसने इंसानियत, न्याय और सच का पक्ष लिया।

समाज के लिए आईना

यह कविता और उस पर आधारित यह विमर्श समाज के लिए एक आईना है। यह हर व्यक्ति से सवाल करता है—आप कहाँ खड़े हैं? सुविधा के साथ, चुप्पी के साथ, या सच के साथ? क्योंकि तटस्थता भी कई बार अन्याय का ही एक रूप होती है।

आज का दौर निर्णायक है। आने वाली पीढ़ियाँ पूछेंगी कि जब सच को दबाया जा रहा था, तब आपने क्या किया। और उस प्रश्न का उत्तर केवल वही दे पाएंगे जिन्होंने जोखिम उठाकर सही पक्ष चुना।

यह लड़ाई बाहर से कम, भीतर से अधिक है। यह आत्मा की लड़ाई है—डर और साहस के बीच, लालच और मूल्यों के बीच। वक़्त गहराई में उतर चुका है। वह देख रहा है, समझ रहा है और लिख रहा है।

और जब वह अंतिम पंक्ति लिखेगा, तब स्पष्ट होगा—

कौन किस तरफ़ खड़ा है इस लड़ाई में।

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