
कवि पवन अग्रवाल की काव्य प्रस्तुति में झलका फागुन का उल्लास
आम्रपाली। भारतीय संस्कृति में होली केवल रंगों का उत्सव नहीं बल्कि प्रेम, भाईचारे और सामाजिक समरसता का प्रतीक पर्व है। फाल्गुन मास के आगमन के साथ ही प्रकृति, समाज और मानवीय संबंधों में नवजीवन का संचार होने लगता है। इसी भावभूमि को शब्दों में साकार करते हुए पवन अग्रवाल द्वारा प्रस्तुत स्वप्रेरित होली गीत ने उत्सव की आत्मा को सुंदर अभिव्यक्ति दी है।
दिनांक 2 मार्च 2026 को लिखी गई यह स्वरचित रचना फागुन की मस्ती, रिश्तों की मिठास और समाज में प्रेम के रंग घोलने का प्रेरणादायी संदेश देती है।
फागुन की आहट और बदलता मौसम
गीत की शुरुआत ही ऋतु परिवर्तन के संकेत से होती है
> “मौसम बदलने की आहट फागुन की होली ले आई,
दुश्मनी की कलम, होली अब दोस्ती में बदल आई।”
इन पंक्तियों में कवि ने प्रकृति और समाज के बीच गहरे संबंध को दर्शाया है। जैसे ही फागुन आता है, वातावरण में उल्लास बढ़ जाता है और मन के भीतर जमी कटुता स्वतः समाप्त होने लगती है।
होली का यही संदेश है कि मन की दूरियाँ मिटाकर रिश्तों को नई शुरुआत दी जाए।
रंगों की बहार और उत्सव की रात
कवि ने फागुन की पूर्णिमा और होली की रात का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया है —
> “आया फाग आया रंगों की बहार को लेकर,
जलती रही पूनम की रात होली की सौगात लेकर।”
यह चित्रण भारतीय परंपरा में होलिका दहन की सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है, जहां बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक अग्नि प्रज्ज्वलित होती है।
रिश्तों में मिठास घोलता पर्व
गीत का मुख्य संदेश सामाजिक एकता और अपनत्व है
> “मन में घोलती रिश्तों की मिठास द्वेष हटा कर,
सब अपने बन जाते होली के पवित्र रंगों को लगा कर।”
कवि बताते हैं कि होली के रंग केवल चेहरे पर नहीं, बल्कि दिलों पर लगते हैं। यह पर्व समाज में भाईचारे और समानता की भावना को मजबूत करता है।
उजाले और आशा का प्रतीक
> “निकलता चाँद आसमान को रोशनी से भर देता,
अंधेरों को जगह नहीं मिलती इतना उजाला वो देता।”
इन पंक्तियों में जीवन दर्शन छिपा है। जैसे चंद्रमा अंधकार को दूर करता है, वैसे ही प्रेम और सकारात्मक सोच जीवन की कठिनाइयों को समाप्त कर सकती है।
गांव से शहर तक उत्सव की धूम
कवि ने ग्रामीण और शहरी दोनों परिवेशों की झलक प्रस्तुत की है —
> “गांव और शहर चारों ओर हुलियारों का शोर होता,
लठमार हो या रंगों की टोली उनसा नहीं जोर होता।”
होली का उत्साह सामाजिक सीमाओं से परे होता है। गांव की चौपाल से लेकर शहर की गलियों तक एक ही रंग दिखाई देता है — खुशी और उल्लास का रंग।
नफरत मिटाने का आह्वान
गीत का सार समाज में प्रेम स्थापित करने का संदेश है
> “नफरत और दुश्मनी को बदले त्योहार होली का,
आओ खुशियाँ मनाएं साथ गाएं मौका है ठिठोली का।”
कवि का यह संदेश वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक है, जहां सामाजिक सौहार्द बनाए रखना सबसे बड़ी आवश्यकता बन गया है।
सांस्कृतिक चेतना का जीवंत उदाहरण
पवन अग्रवाल की यह रचना भारतीय लोक परंपरा से जुड़ी सहज और सरल भाषा में लिखी गई है, जो आम जनमानस को सीधे प्रभावित करती है। गीत में उत्सव, संस्कृति और मानवीय मूल्यों का सुंदर समन्वय दिखाई देता है।
यह स्वप्रेरित होली गीत केवल शुभकामना संदेश नहीं, बल्कि समाज को जोड़ने वाली सकारात्मक सोच का प्रतीक है। कवि ने होली को प्रेम, प्रकाश और मानवता का पर्व बताते हुए सभी को मिलजुलकर खुशियाँ मनाने का संदेश दिया है।
रंगों का यह त्योहार हर दिल में प्रेम, विश्वास और सौहार्द के नए रंग भरता रहे — यही इस रचना की मूल भावना है।
होली पर्व की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ।









