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नेशनल होम्योपैथी कॉन्फ्रेंस ‘अमृतम’ का शुभारंभ, आयुष चिकित्सा के विस्तार और अनुसंधान को मिलेगा नया आयाम

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HQ Report

भोपाल। सेवा, संवेदना और समर्पण को चिकित्सा का वास्तविक आधार बताते हुए मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि स्वास्थ्य केवल रोगों के उपचार का विषय नहीं, बल्कि मानव जीवन को संतुलित, स्वस्थ और समृद्ध बनाने का व्यापक माध्यम है। इसी भावना के साथ प्रदेश सरकार आयुष चिकित्सा पद्धतियों के संरक्षण, संवर्धन और विस्तार के लिए निरंतर कार्य कर रही है। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने भोपाल स्थित पंडित खुशीलाल शर्मा आयुर्वेद संस्थान के रजत जयंती सभागार में आयोजित राष्ट्रीय होम्योपैथी सम्मेलन ‘अमृतम’ का शुभारंभ करते हुए यह विचार व्यक्त किए।

राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में देशभर से आए होम्योपैथिक चिकित्सकों, शिक्षाविदों, शोधकर्ताओं, विशेषज्ञों तथा आयुष क्षेत्र से जुड़े प्रतिनिधियों ने सहभागिता की। कार्यक्रम में होम्योपैथी चिकित्सा की वर्तमान स्थिति, अनुसंधान की संभावनाओं, शिक्षा व्यवस्था, आधुनिक तकनीक के उपयोग तथा जनसामान्य तक प्रभावी स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई।

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मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने अपने संबोधन में कहा कि भारत की पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियां हजारों वर्षों की ज्ञान परंपरा और अनुभव का परिणाम हैं। आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी जैसी चिकित्सा पद्धतियां आज विश्व स्तर पर अपनी उपयोगिता सिद्ध कर रही हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आयुष क्षेत्र को अभूतपूर्व प्रोत्साहन मिला है, जिसके कारण भारतीय चिकित्सा प्रणालियों को राष्ट्रीय ही नहीं बल्कि वैश्विक स्तर पर नई पहचान प्राप्त हुई है।

मुख्यमंत्री ने कहा कि आज विश्व स्वास्थ्य के क्षेत्र में समग्र दृष्टिकोण को महत्व दे रहा है। लोग केवल दवाओं पर निर्भर रहने के बजाय ऐसी चिकित्सा पद्धतियों की ओर आकर्षित हो रहे हैं जो शरीर, मन और जीवनशैली के संतुलन पर आधारित हों। होम्योपैथी इसी सोच का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जो कम लागत में प्रभावी उपचार उपलब्ध कराने की क्षमता रखती है।

उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश सरकार आयुष शिक्षा और चिकित्सा अधोसंरचना को मजबूत बनाने के लिए अनेक कदम उठा रही है। प्रदेश में आयुष संस्थानों का विस्तार किया जा रहा है तथा चिकित्सा सेवाओं को ग्रामीण क्षेत्रों तक पहुंचाने के लिए भी प्रयास किए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने इस अवसर पर उज्जैन में नवीन शासकीय होम्योपैथी चिकित्सा महाविद्यालय स्थापित करने की दिशा में सकारात्मक पहल किए जाने की घोषणा करते हुए कहा कि इससे प्रदेश के विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को नई संभावनाएं प्राप्त होंगी तथा होम्योपैथी चिकित्सा शिक्षा को और अधिक मजबूती मिलेगी।

उन्होंने कहा कि चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान का उद्देश्य केवल डिग्री प्रदान करना नहीं बल्कि समाज को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना होना चाहिए। चिकित्सक समाज के लिए आशा और विश्वास का केंद्र होते हैं। इसलिए चिकित्सा क्षेत्र से जुड़े सभी लोगों को सेवा और संवेदनशीलता की भावना के साथ कार्य करना चाहिए।

सम्मेलन में राष्ट्रीय होम्योपैथी आयोग, नई दिल्ली के अध्यक्ष डॉ. तारकेश्वर जैन ने होम्योपैथी चिकित्सा के बदलते स्वरूप और आधुनिक अनुसंधान की आवश्यकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि होम्योपैथी केवल वैकल्पिक चिकित्सा नहीं बल्कि वैज्ञानिक आधार पर विकसित एक प्रभावी चिकित्सा प्रणाली है, जिसे आज विश्व के अनेक देशों में स्वीकार्यता मिल रही है। उन्होंने शोध, गुणवत्ता और आधुनिक शिक्षा पद्धति को और अधिक मजबूत बनाने पर जोर दिया।

आरोग्य भारती के राष्ट्रीय संगठन सचिव डॉ. अशोक कुमार वार्ष्णेय ने कहा कि भारतीय चिकित्सा परंपरा मानवता के कल्याण की भावना पर आधारित है। आज आवश्यकता है कि आधुनिक विज्ञान और पारंपरिक ज्ञान का समन्वय कर स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक प्रभावी बनाया जाए। उन्होंने होम्योपैथी सहित आयुष चिकित्सा प्रणालियों के प्रति बढ़ते जनविश्वास को सकारात्मक संकेत बताया।

कार्यक्रम में अपर सचिव सह आयुक्त आयुष डॉ. संजय मिश्रा ने मध्यप्रदेश में आयुष विभाग द्वारा संचालित विभिन्न योजनाओं और उपलब्धियों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि प्रदेश में आयुष चिकित्सा संस्थानों के सुदृढ़ीकरण, चिकित्सकों के प्रशिक्षण, अनुसंधान गतिविधियों के विस्तार तथा स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार की प्राथमिकता है कि आम नागरिकों को सुलभ, किफायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं।

प्रख्यात प्रबंधन विशेषज्ञ श्री एस.बी. डंगायच ने चिकित्सा संस्थानों में प्रबंधन और नवाचार की भूमिका पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि बदलते समय में चिकित्सा शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को नई तकनीकों के साथ जोड़ना आवश्यक है, ताकि मरीजों को बेहतर सुविधाएं मिल सकें और चिकित्सा संस्थान अधिक प्रभावी ढंग से कार्य कर सकें।

सम्मेलन में प्रदेश के विभिन्न होम्योपैथिक चिकित्सा महाविद्यालयों के प्राचार्यों, चिकित्सकों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों ने भी सहभागिता की। इस दौरान शोध पत्र प्रस्तुत किए गए तथा होम्योपैथी चिकित्सा से जुड़े विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञों द्वारा व्याख्यान दिए गए। कार्यक्रम ने चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में नए विचारों के आदान-प्रदान के लिए एक महत्वपूर्ण मंच प्रदान किया।

विशेषज्ञों ने कहा कि वर्तमान समय में गैर-संचारी रोगों, जीवनशैली से जुड़ी समस्याओं और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों के समाधान में होम्योपैथी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि अनुसंधान को बढ़ावा दिया जाए तथा वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर चिकित्सा पद्धति को और अधिक सुदृढ़ बनाया जाए।

कार्यक्रम में उपस्थित चिकित्सकों और विशेषज्ञों ने विश्वास व्यक्त किया कि आयुष और होम्योपैथी चिकित्सा के क्षेत्र में हो रहे सकारात्मक प्रयास भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं को नई दिशा देंगे। साथ ही यह भी कहा गया कि चिकित्सा का वास्तविक उद्देश्य केवल रोगों का उपचार नहीं बल्कि स्वस्थ समाज का निर्माण है।

राष्ट्रीय होम्योपैथी सम्मेलन ‘अमृतम’ का आयोजन इसी उद्देश्य को आगे बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है। सम्मेलन ने यह संदेश दिया कि सेवा, संवेदना, अनुसंधान और नवाचार के समन्वय से स्वास्थ्य क्षेत्र को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के नेतृत्व में मध्यप्रदेश सरकार द्वारा आयुष चिकित्सा पद्धतियों को प्रोत्साहित करने के प्रयास न केवल प्रदेश बल्कि देशभर में स्वास्थ्य सेवाओं के विकास के लिए प्रेरणादायी सिद्ध हो रहे हैं।

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