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तिरुवनंतपुरम (केरल) में ‘ग्लोबल प्राइड अचीवर्स अवार्ड–2026’ से सम्मानित शिक्षाविद्, जिन्होंने अपना जीवन बच्चों और समाज के नाम किया

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सेवा नहीं, साधना का नाम है मणिप्रभा त्रिपाठी
शिक्षा, पर्यावरण और समाजसेवा की प्रेरक मिसाल
तिरुवनंतपुरम/सारंगढ़। समाज में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं, जो अपने पद या दायित्व से नहीं, बल्कि अपने कर्म, समर्पण और सेवा-भाव से पहचाने जाते हैं। वे अपने कार्यों से आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन जाते हैं। छत्तीसगढ़ के सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले की वरिष्ठ शिक्षाविद् एवं समाजसेवी श्रीमती मणिप्रभा त्रिपाठी ऐसी ही एक प्रेरणादायी शख्सियत हैं, जिन्होंने शिक्षा को केवल रोजगार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का माध्यम माना और विद्यालय को संस्कारों की पाठशाला बनाकर हजारों विद्यार्थियों के जीवन को नई दिशा दी।
उनके इसी आजीवन समर्पण, शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक सेवा तथा विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए किए गए कार्यों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित करते हुए गोपाल किरण समाजसेवी संस्था (GKSSS) द्वारा केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम में आयोजित 22वीं राष्ट्रीय कार्यशाला एवं राष्ट्रीय सम्मान समारोह में ‘ग्लोबल प्राइड अचीवर्स अवार्ड–2026’ से सम्मानित किया गया। यह सम्मान न केवल उनके व्यक्तिगत योगदान का सम्मान है, बल्कि छत्तीसगढ़ की शिक्षकीय परंपरा और सेवा संस्कृति का भी गौरव है।
संघर्ष से शुरू हुई सेवा यात्रा
श्रीमती मणिप्रभा त्रिपाठी की पहली नियुक्ति 25 जुलाई 1995 को प्राथमिक शाला चिखली में सहायक शिक्षक (प्रभारी प्रधान पाठक) के रूप में हुई। विद्यालय तक पहुंचने का रास्ता कीचड़ और गड्ढों से भरा हुआ था। अधिकांश लोग इसे व्यवस्था की कमी मानकर छोड़ देते, लेकिन उन्होंने इसे अपनी जिम्मेदारी माना। पहले ही दिन उन्होंने स्वयं फावड़ा और घमेला उठाकर रास्ते में मिट्टी डालना शुरू किया। उनकी मेहनत देखकर ग्रामीण भी प्रेरित हुए और श्रमदान के माध्यम से विद्यालय तक सुगम मार्ग तैयार किया गया।
इसके बाद उन्होंने विद्यालय परिसर में सुंदर पुष्पवाटिका विकसित की, अनेक पौधे लगाए और पूरे विद्यालय को हरित वातावरण में बदल दिया। उनके इन प्रयासों के लिए उन्हें विकासखंड, संकुल और जिला स्तर पर अनेक सम्मान प्राप्त हुए। आज भी उनके लगाए गए वृक्ष उस विद्यालय की पहचान बने हुए हैं।
शिक्षा के साथ संस्कार और पर्यावरण को दिया महत्व
श्रीमती त्रिपाठी ने अपने पूरे शिक्षकीय जीवन में केवल पाठ्यपुस्तकों तक शिक्षा को सीमित नहीं रखा। उन्होंने विद्यार्थियों को योग, अनुशासन, नैतिक शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण, स्वच्छता और सामाजिक जिम्मेदारियों का भी पाठ पढ़ाया। उन्होंने विभिन्न विद्यालयों और संस्थानों में कार्य करते हुए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा को नई दिशा प्रदान की।
डाइट धरमजयगढ़ में प्रतिनियुक्ति के दौरान उन्होंने प्रशिक्षण परिसर के सौंदर्यीकरण एवं हरित विकास में उल्लेखनीय योगदान दिया। इस दौरान उन्होंने शिक्षकों को नवाचार आधारित शिक्षण पद्धति से भी परिचित कराया।
अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय शिक्षा का प्रतिनिधित्व
श्रीमती मणिप्रभा त्रिपाठी को एनसीईआरटी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित शिशु शिक्षा एवं देखभाल विषयक विशेष प्रशिक्षण में भाग लेने का अवसर मिला। इस प्रशिक्षण में 48 देशों के प्रतिभागी शामिल हुए, जहां उन्होंने भारतीय शिक्षा प्रणाली, संस्कृति और मूल्यों का प्रभावी प्रस्तुतीकरण किया। यह उनके शिक्षकीय अनुभव और प्रतिभा का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सम्मान था।
निजी संसाधनों से बदली विद्यालय की तस्वीर
10 नवम्बर 2010 को माध्यमिक शाला सहसपुर में पदभार ग्रहण करते समय विद्यालय अत्यंत जर्जर अवस्था में था। भवन खस्ताहाल था, पेयजल और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव था तथा पूरा परिसर बंजर पड़ा हुआ था।
शासन की सहायता की प्रतीक्षा करने के बजाय उन्होंने स्वयं पहल करते हुए अपने निजी संसाधनों से लगभग 15 लाख रुपये खर्च कर विद्यालय का कायाकल्प कर दिया। विद्यालय में स्वच्छ पेयजल व्यवस्था, एक्वागार्ड, सिंक, बालक शौचालय, चबूतरे, पुस्तकालय, विज्ञान, गणित एवं अंग्रेजी लर्निंग कॉर्नर, आधुनिक कार्यालय तथा आकर्षक किचन गार्डन का निर्माण कराया।
विद्यालय बना जैविक शिक्षा का मॉडल
विद्यालय परिसर में उन्होंने आम, अमरूद, संतरा, केला, पपीता, चीकू, लीची, कटहल, सीताफल, रामफल, शहतूत, स्टार फ्रूट सहित अनेक फलदार वृक्ष लगाए। साथ ही जैविक सब्जियों की खेती भी शुरू कराई। वर्षों से इन फलों और सब्जियों का उपयोग विद्यार्थियों के मध्यान्ह भोजन में किया जा रहा है, जिससे हजारों बच्चों को पौष्टिक एवं जैविक भोजन प्राप्त हुआ।
विद्यालय की दीवारों को ज्ञानवर्धक चित्रों से सजाकर उसे प्रिंट-रिच वातावरण में परिवर्तित किया गया। आज भी विद्यालय का हराभरा परिसर उनके दूरदर्शी प्रयासों का जीवंत प्रमाण है।
सेवानिवृत्ति के बाद भी नहीं रुकी सेवा
31 अगस्त 2025 को सेवानिवृत्त होने के बाद भी उनका सेवाभाव समाप्त नहीं हुआ। पुनर्नियुक्ति अवधि 30 अप्रैल 2026 तक उन्होंने बच्चों को अंग्रेजी, योग, नैतिक शिक्षा, संगीत, चित्रकला एवं सांस्कृतिक गतिविधियों का प्रशिक्षण दिया। उनका स्पष्ट मानना है कि शिक्षक कभी सेवानिवृत्त नहीं होता, बल्कि जीवनभर समाज का मार्गदर्शक बना रहता है।
आज भी उनका संकल्प है कि वे अपने जीवन का प्रत्येक क्षण विद्यालय, विद्यार्थियों और समाज की सेवा में समर्पित रखेंगी।
राष्ट्रीय स्तर पर मिला सम्मान
गोपाल किरण समाजसेवी संस्था (GKSSS) के अध्यक्ष श्रीप्रकाश सिंह निमराजे ने कहा कि श्रीमती मणिप्रभा त्रिपाठी केवल एक शिक्षिका नहीं, बल्कि शिक्षा, पर्यावरण संरक्षण और समाजसेवा की जीवंत मिसाल हैं। संस्था द्वारा उन्हें इससे पूर्व ‘गुरु घासीदास आजीवन अचीवर्स अवार्ड’ सहित अनेक राष्ट्रीय सम्मानों से भी अलंकृत किया जा चुका है।
उन्होंने देश के विभिन्न राज्यों में आयोजित राष्ट्रीय कार्यशालाओं, सेमिनारों, सामाजिक अभियानों एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों में सक्रिय सहभागिता निभाकर शिक्षा और समाजसेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान दिया है।
सेवा ही सबसे बड़ा सम्मान
श्री निमराजे ने कहा—
“मणिप्रभा त्रिपाठी का जीवन हमें यह संदेश देता है कि सेवा-निवृत्ति केवल सरकारी नौकरी का अंत हो सकती है, समाजसेवा का नहीं। जब कोई शिक्षक अपने वेतन, समय, श्रम और जीवन को विद्यार्थियों के भविष्य के लिए समर्पित कर देता है, तब वह केवल शिक्षक नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता बन जाता है।”
छत्तीसगढ़ का गौरव
तिरुवनंतपुरम में प्राप्त ‘ग्लोबल प्राइड अचीवर्स अवार्ड–2026’ श्रीमती मणिप्रभा त्रिपाठी के आजीवन समर्पण, उत्कृष्ट शिक्षण, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक उत्तरदायित्व एवं मानवीय मूल्यों के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का राष्ट्रीय सम्मान है।
उनकी जीवन यात्रा आज देशभर के शिक्षकों, समाजसेवियों, विद्यार्थियों और युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत बन चुकी है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि यदि सेवा को साधना मान लिया जाए, तो एक शिक्षक अकेले भी समाज और राष्ट्र के भविष्य को बदल सकता है।
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