
जबलपुर। मध्यप्रदेश हाई कोर्ट ने प्रदेश की लाखों आंगनबाड़ी कार्यकर्ता एवं सहायिकाओं के हित में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि केंद्र सरकार द्वारा मानदेय के लिए बढ़ाए गए अंशदान का लाभ आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं और सहायिकाओं तक पहुंचना चाहिए था तथा राज्य सरकार द्वारा अपने हिस्से के अंशदान में कटौती कर कुल मानदेय को लगभग पहले जैसा बनाए रखना न्यायसंगत नहीं माना जा सकता। अदालत ने इस व्यवस्था को गलत ठहराते हुए राज्य सरकार की अपील को केवल आंशिक रूप से स्वीकार किया है। न्यायालय के इस फैसले को प्रदेशभर की हजारों महिला कर्मियों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, जो लंबे समय से अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही थीं।
यह मामला पिछले कई वर्षों से मध्यप्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर खंडपीठ में विचाराधीन था। प्रदेश की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं लगातार यह मांग कर रही थीं कि केंद्र सरकार द्वारा बढ़ाई गई आर्थिक सहायता का पूरा लाभ उन्हें मिलना चाहिए। उनका आरोप था कि केंद्र सरकार ने मानदेय में वृद्धि के उद्देश्य से अपना वित्तीय अंशदान बढ़ाया था, लेकिन राज्य सरकार ने अपने हिस्से की राशि में लगभग उतनी ही कटौती कर दी, जिसके कारण उनके हाथ में आने वाली कुल राशि में कोई विशेष बढ़ोतरी नहीं हुई। इससे केंद्र सरकार के निर्णय का उद्देश्य भी प्रभावित हुआ और कर्मचारियों को अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया।
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति आनंद पाठक और न्यायमूर्ति बी.पी. शर्मा की युगलपीठ ने की। राज्य सरकार ने पूर्व में दिए गए आदेश के विरुद्ध अपील प्रस्तुत की थी। विस्तृत सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने राज्य सरकार की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं और यह स्पष्ट किया कि मानदेय में इस प्रकार की कटौती उचित नहीं थी।
संगठन ने उठाई थी आवाज
यह पूरा विवाद मप्र बुलंद आवाज नारी शक्ति आंगनबाड़ी कार्यकर्ता व सहायिका संगठन, भोपाल द्वारा दायर याचिका से जुड़ा हुआ है। संगठन ने न्यायालय को बताया कि 27 जून 2019 को केंद्र सरकार ने देशभर की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं के मानदेय में वृद्धि के उद्देश्य से अपने अंशदान में बढ़ोतरी की थी। केंद्र सरकार का उद्देश्य था कि महिला कर्मियों को अधिक आर्थिक सहायता मिले और उनके कार्य के अनुरूप सम्मानजनक मानदेय सुनिश्चित किया जा सके।
याचिका में कहा गया कि केंद्र सरकार के इस निर्णय के बाद राज्य सरकार को भी अपने हिस्से का अंशदान पूर्ववत रखना चाहिए था, ताकि केंद्र की बढ़ी हुई राशि सीधे कर्मचारियों को अतिरिक्त लाभ के रूप में मिलती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। राज्य सरकार ने अपने हिस्से की राशि में लगभग उतनी ही कमी कर दी, जिससे कुल मानदेय में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हो सकी।
बढ़ी सहायता का लाभ नहीं मिला
याचिकाकर्ता संगठन का कहना था कि केंद्र सरकार ने जिस उद्देश्य से आर्थिक सहायता बढ़ाई थी, वह उद्देश्य ही समाप्त हो गया। यदि केंद्र सरकार ने अपने हिस्से में वृद्धि की और राज्य सरकार ने उसी अनुपात में अपनी हिस्सेदारी घटा दी, तो कर्मचारियों को वास्तविक लाभ कैसे मिलेगा? संगठन ने इसे कर्मचारियों के साथ अन्याय बताते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की थी।
याचिका में यह भी कहा गया कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं वर्षों से महिला एवं बाल विकास विभाग की योजनाओं को गांव-गांव और शहर-शहर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। वे गर्भवती महिलाओं की देखभाल, बच्चों के पोषण, टीकाकरण कार्यक्रम, कुपोषण उन्मूलन, किशोरी बालिकाओं के स्वास्थ्य, मातृ एवं शिशु कल्याण सहित अनेक सरकारी योजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन करती हैं। इसके बावजूद उन्हें मिलने वाला मानदेय पहले से ही सीमित है। ऐसे में केंद्र सरकार द्वारा बढ़ाई गई सहायता का लाभ भी यदि उन्हें नहीं मिले तो यह उनके साथ अन्याय है।
अदालत ने क्या कहा
सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने पूरे मामले का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने केंद्र सरकार की योजना, वित्तीय व्यवस्था तथा राज्य सरकार द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया का अध्ययन किया। इसके बाद न्यायालय ने माना कि केंद्र सरकार द्वारा बढ़ाए गए अंशदान का उद्देश्य कर्मचारियों को अतिरिक्त आर्थिक लाभ देना था। यदि राज्य सरकार अपने हिस्से में कटौती कर दे और कुल मानदेय पहले जैसा ही बना रहे तो इससे योजना का मूल उद्देश्य प्रभावित होता है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कर्मचारियों के हितों की अनदेखी नहीं की जा सकती। राज्य सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए जिससे केंद्र सरकार द्वारा दी गई अतिरिक्त सहायता का वास्तविक लाभ संबंधित कर्मचारियों तक पहुंचे।
राज्य सरकार की अपील आंशिक रूप से स्वीकार
इस मामले में राज्य सरकार ने पूर्व आदेश के विरुद्ध अपील दायर की थी। हाई कोर्ट ने अपील पर सुनवाई करते हुए कुछ बिंदुओं पर राज्य सरकार की दलीलों को स्वीकार किया, लेकिन मानदेय में की गई कटौती को उचित नहीं माना। अदालत ने अपने निर्णय में स्पष्ट संकेत दिए कि कर्मचारियों के आर्थिक हितों की रक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है।
प्रदेशभर में खुशी की लहर
हाई कोर्ट के फैसले के बाद प्रदेशभर की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं में खुशी का माहौल है। कर्मचारी संगठनों ने इस निर्णय का स्वागत करते हुए इसे महिला कर्मियों की लंबी कानूनी लड़ाई की बड़ी जीत बताया है। उनका कहना है कि वर्षों से वे इस मुद्दे को लेकर आंदोलन, ज्ञापन और न्यायालय की शरण लेती रही हैं। अब अदालत के फैसले से उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद जगी है।
संगठनों का कहना है कि यदि राज्य सरकार हाई कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप कार्रवाई करती है तो हजारों महिला कर्मियों को आर्थिक राहत मिलेगी। इससे उनके जीवन स्तर में सुधार होगा और वे अधिक उत्साह के साथ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर सकेंगी।
आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं की अहम भूमिका
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं देश की समेकित बाल विकास सेवा (आईसीडीएस) योजना की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती हैं। वे ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में बच्चों के पोषण, प्रारंभिक शिक्षा, गर्भवती एवं धात्री महिलाओं की देखभाल, टीकाकरण, स्वास्थ्य जागरूकता और पोषण कार्यक्रमों को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
कोविड-19 महामारी के दौरान भी इन महिला कर्मियों ने घर-घर पहुंचकर पोषण सामग्री वितरण, स्वास्थ्य सर्वेक्षण और जनजागरूकता अभियान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इसके बावजूद लंबे समय से वे अपने मानदेय में वृद्धि और सेवा शर्तों में सुधार की मांग करती रही हैं।
फैसले के दूरगामी प्रभाव
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाई कोर्ट का यह फैसला भविष्य में केंद्र और राज्य सरकारों के बीच वित्तीय साझेदारी वाली योजनाओं के लिए भी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यदि किसी योजना में केंद्र सरकार अतिरिक्त सहायता देती है तो उसका वास्तविक लाभ लाभार्थियों तक पहुंचना आवश्यक है। राज्य सरकारें अपने हिस्से में कटौती कर उस उद्देश्य को निष्प्रभावी नहीं बना सकतीं।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि यह निर्णय केवल आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भविष्य में अन्य योजनाओं में भी वित्तीय पारदर्शिता और लाभार्थियों के अधिकारों की रक्षा के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकता है।
अब राज्य सरकार पर निगाहें
हाई कोर्ट के फैसले के बाद अब सभी की निगाहें राज्य सरकार की अगली कार्रवाई पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि सरकार न्यायालय के निर्देशों का पालन करते हुए आवश्यक प्रशासनिक एवं वित्तीय निर्णय लेगी, ताकि प्रभावित आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाओं को उनका उचित लाभ मिल सके। यदि ऐसा होता है तो प्रदेश की हजारों महिला कर्मियों को आर्थिक राहत मिलने के साथ-साथ उनके लंबे समय से चले आ रहे विवाद का भी समाधान हो सकेगा।
हाई कोर्ट का यह फैसला महिला कर्मियों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे यह संदेश भी गया है कि सरकारी योजनाओं का उद्देश्य तभी पूरा माना जाएगा जब उनका वास्तविक लाभ अंतिम लाभार्थी तक पहुंचे। आंगनबाड़ी कार्यकर्ता और सहायिकाएं वर्षों से समाज के सबसे कमजोर वर्गों के बीच सेवाएं दे रही हैं और उनके हितों की रक्षा करना सरकार एवं प्रशासन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।









