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संघ के 100 साल: वंदेमातरम की धरती पर जब ‘कोकेन’ बने डॉक्टर हेडगेवार

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Bureau Report

बंगाल की क्रांतिकारी मिट्टी से निकली थी आएसएस की वैचारिक चिंगारी

नई दिल्ली । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का नाम आमतौर पर एक संगठनकर्ता और राष्ट्रवादी विचारक के रूप में लिया जाता है, लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि उनके जीवन का एक अध्याय क्रांतिकारी कोड नेम, ‘कोकेन’ से जुड़ा है। यह नाम उन्हें अविभाजित बंगाल की उस धरती पर मिला था, जहां “वंदेमातरम” की गूंज क्रांति का प्रतीक थी। दरअसल स्कूली जीवन में अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन के कारण स्कूल से निकाले जाने के बाद, डॉ. हेडगेवार ने एक राष्ट्रीय विद्यालय में प्रवेश लिया। यहीं उनकी मुलाकात क्रांतिकारी माधवराव सन्यासी से हुई, जिन्हें नागपुर में उन्होंने छिपाया था। माधवराव के संपर्क ने उनके मन में क्रांति की लौ जला दी। बाद में उन्होंने अलीपुर बम कांड के लिए आर्थिक सहयोग भी जुटाया। 1909 में उन्होंने मैट्रिक परीक्षा पास की, जिसके प्रमाणपत्र पर रास बिहारी बोस के हस्ताक्षर थे। उसी दौर में वे कलकत्ता के नेशनल मेडिकल कॉलेज पहुंचे, जहां क्रांतिकारियों और छात्रों के बीच उनका संपर्क और मजबूत हुआ। यहां उन्होंने गणेशोत्सव और राष्ट्रवादी विचारों को छात्रों में लोकप्रिय बनाया। कोड नेम ‘कोकेन’ और अनुशीलन समिति बताया जाता है कि कलकत्ता में उन्होंने प्रसिद्ध अनुशीलन समिति की कोर टीम में जगह बनाई। समिति के क्रांतिकारी सदस्य गुप्त कोड नेम से काम करते थे। इसी दौरान डॉ. हेडगेवार को ‘कोकेन’ नाम दिया गया। उनकी जिम्मेदारी थी, देशभर के क्रांतिकारियों तक हथियार और क्रांतिकारी साहित्य पहुंचाना। वह साहित्य को “एनाटोमी” कहते थे, जो मेडिकल अध्ययन का उनका विषय भी था। क्रांतिकारी से संगठनकर्ता तक बताया जाता है कि 1918 के बाद जब सशस्त्र क्रांति का चरण कमजोर पड़ा, तो डॉ. हेडगेवार ने लोकमान्य तिलक और सावरकर जैसे नेताओं की सलाह पर आंदोलन की दिशा बदली। उन्होंने महसूस किया कि सशस्त्र संघर्ष के बजाय मजबूत संगठन की आवश्यकता है। तभी से उन्होंने कांग्रेस और असहयोग आंदोलन में भाग लिया, जेल भी गए, लेकिन बाद में कांग्रेस की नीतियों से असहमत होकर 1925 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।

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