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विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस: ज्ञान की विरासत और रचनात्मक अधिकारों का उत्सव 

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Bureau Report

प्रतिवर्ष विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस 23 अप्रैल को मनाया जाता है। यह यूनेस्को द्वारा मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य आम लोगों में पढ़ने की आदत, पुस्तकों और लेखकों को सम्मान देना है। सच तो यह है कि इस दिवस का मुख्य उद्देश्य लोगों में पढ़ने की रूचियों को बढ़ावा देना, पुस्तकों के महत्व के प्रति जागरूकता फैलाना, दुनिया भर के लेखकों, साहित्यकारों और रचनाकारों का सम्मान करना, विशेष रूप से एआइ के इस युग में कॉपीराइट कानूनों के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा नई पीढ़ी को ज्ञान और साहित्य से जोड़ना है। सरल शब्दों में कहें तो यह दिवस दुनिया भर में पुस्तकों, लेखकों, प्रकाशकों, पाठकों और बौद्धिक संपदा के उनके अधिकारों (राइट्स) के महत्व को रेखांकित करता है। इस दिवस थीम(विषय) और विश्व पुस्तक राजधानी:- पाठकों को बताता चलूं कि इस वर्ष का केंद्रीय संदेश या यूं कहें कि थीम पुस्तकों की शक्ति, पठन संस्कृति और भाषाई विविधता को बढ़ावा देने पर आधारित है। वर्ष 2025 में विश्व पुस्तक और कॉपीराइट दिवस की थीम रीड योर वे (अपने तरीके से पढ़ें) रखी गई है। यहां पाठकों को यह भी बताता चलूं कि मोरक्को की राजधानी रबात को 2026 की विश्व पुस्तक राजधानी चुना गया है, जो कि मोरक्को का राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र कहलाता है, जो पुस्तकों, पठन संस्कृति और ज्ञान को बढ़ावा देने के लिए दिया जाता है। आज के डिजिटल दौर/समय में पुस्तकों का महत्व :- आज का दौर डिजिटल दौर है और इस डिजिटल दौर में भी पुस्तकों का महत्व और उपयोगिता कतई कम नहीं हुई है, जैसा कि पुस्तकें केवल पन्ने नहीं, अनुभवों और विचारों का खजाना होतीं हैं। दरअसल, पुस्तकें ज्ञान का अथाह भंडार होती हैं तथा ये किताबें ही होती हैं जो हमारे अतीत और भविष्य के बीच एक योजक कड़ी के रूप में काम करती हैं। प्रसिद्ध लेखक जे.के. रोलिंग ने यह बात कही है कि- यदि आपको पढ़ना पसंद नहीं है, तो आपको सही किताब नहीं मिली है। कहना ग़लत नहीं होगा कि किताबें और दरवाज़े एक ही चीज़ हैं। आप उन्हें खोलते हैं, और आप दूसरी दुनिया में चले जाते हैं। वास्तव में, किताबें पीढ़ियों और संस्कृतियों के बीच एक सेतु की भूमिका निभाती हैं। सिसेरो ने कहा है- पुस्तकों के बिना एक कमरा आत्मा के बिना शरीर की तरह है। इस दिवस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:- उपलब्ध जानकारी के अनुसार सर्वप्रथम वर्ष 1995 में, यूनेस्को ने 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस के रूप में नामित किया था, क्योंकि इस दिन महान नाटककार विलियम शेक्सपियर, इंका गार्सिलसो-डे-ला-वेगा और मिगुएल डे सर्वेंट्स सहित कई महान लेखकों की मृत्यु हुई थी और इस दिवस पर इन सभी साहित्यकारों का स्मरण किया जाता है। दरअसल, यूनेस्को ने वर्ष 1995 में पेरिस में आयोजित अपने महाधिवेशन के कारण भी 23 अप्रैल को ही यह दिन तय किया था। इसमें लेखकों और उनकी अनुकरणीय पुस्तकों को श्रद्धांजलि दी गई। यह भी उल्लेखनीय है कि विश्व पुस्तक दिवस पहली बार 7 अक्टूबर, 1926 को मनाया गया था और विसेंट क्लेवेल एन्ड्रेस ने विश्व पुस्तक दिवस मनाने का विचार 1922 में प्रस्तुत किया। इसकी शुरुआत स्पेन के कैटालोनिया क्षेत्र से हुई थी, जहाँ इसे सेंट जॉर्ज डे के रूप में मनाया जाता है। परंपरा यह है कि इस दिन लोग एक-दूसरे को गुलाब देते हैं, और बदले में किताब भेंट की जाती है। कैटेलोनिया में 23 अप्रैल को ला दीदा डे सैंट जोर्डी के रूप में जाना जाता है और इस दिन, जैसा कि ऊपर भी इस आलेख में चर्चा कर चुका हूं कि प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए पुस्तकों और गुलाबों का आदान-प्रदान करना पारंपरिक है। गौरतलब है कि विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस आधिकारिक तौर पर 1955 में मनाया गया था। हालाँकि, इस दिन की शुरुआत 1922 में विसेंट क्लेवेल एंड्रेस द्वारा महान स्पेनिश लेखक मिगुएल डे सर्वेंट्स के सम्मान में की गई थी। यूनेस्को द्वारा पहली बार 1995 में इस दिवस की घोषणा की गई थी। कॉपीराइट और कानूनी अधिकार:- आज संचार क्रांति, एआइ या यूं कहें कि डिजिटल युग में भी पुस्तकों की उपयोगिता कम नहीं हुई है। ये कॉपीराइट अधिकार ही हैं जो हर लेखक/साहित्यकार की रचनात्मक मेहनत की रक्षा करते हैं। कॉपीराइट किसी लेखक, कलाकार, संगीतकार या रचनाकार की मौलिक कृति की सुरक्षा करता है। इससे उनकी अनुमति के बिना रचना की नकल, बिक्री या दुरुपयोग नहीं किया जा सकता। गौरतलब है कि कॉपीराइट विचार को सुरक्षित नहीं करता, बल्कि उस विचार को व्यक्त करने के तरीके को सुरक्षित करता है। यह भी गौरतलब है कि दुनिया का पहला कॉपीराइट कानून ऐनी का क़ानून (1710) था। इससे पहले, कॉपीराइट लेखक के पास नहीं, बल्कि प्रकाशक के पास होता था। उस समय इंग्लैंड में स्टेशनर्स कंपनी का एकाधिकार था। इस कानून ने पहली बार माना कि रचना पर असली अधिकार रचयिता का है। कहना ग़लत नहीं होगा कि वर्तमान डिजिटल युग में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआइ) ने कॉपीराइट की सदियों पुरानी परिभाषा को हिला कर रख दिया है। मशीन केवल सूचनाओं को संकलित कर सकती है, लेकिन मौलिक संवेदना और अनुभव केवल मानव मस्तिष्क की उपज है और कॉपीराइट इसी संवेदना का सम्मान है। यहां पाठकों को बता दूं कि कापीराइट कानून में पेंटिंग, फ़ोटोग्राफ़, संगीत, कंप्यूटर प्रोग्राम, नाटक, फिल्म, किताबें, वास्तुशिल्प, कविताएं, कहानियां और ब्लॉग पोस्ट शामिल किए जा सकते हैं। कॉपीराइट हमेशा के लिए नहीं होता। लेखक की मृत्यु के 60 से 70 साल बाद (देश के अनुसार) रचनाएँ पब्लिक डोमेन में आ जाती हैं। भारत में किसी किताब पर कॉपीराइट लेखक की मृत्यु के वर्ष के अंत से 60 वर्ष तक रहता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी लेखक का निधन 2026 में होता है, तो उनकी रचनाएँ 31 दिसंबर 2086 तक सुरक्षित रहेंगी और 1 जनवरी 2087 को पब्लिक डोमेन में आएँगी। मुंशी प्रेमचंद, शेक्सपियर और टैगोर की रचनाएं अब सबके साझा ज्ञान का हिस्सा हैं। सरल शब्दों में कहें तो भारत में कॉपीराइट अधिनियम 1957 निर्माता को 60 वर्षों के लिए सुरक्षा प्रदान करता है, जिसमें सबसे हालिया संशोधन वर्ष 2012 में हुआ था। कॉपीराइट (संशोधन) नियम 2021 को अन्य प्रासंगिक कानूनों के अनुरूप लाने के लिये कार्यान्वित किया गया था। बहरहाल, कहना ग़लत नहीं होगा कि आज के समय में कॉपीराइट का उद्देश्य केवल अधिकार जताना नहीं है, जैसा कि दिल्ली उच्च न्यायालय (2016) ने कहा था-इसका उद्देश्य ज्ञान की फसल को बढ़ाना है, न कि उसे बाधित करना। यह कानून लेखकों को प्रोत्साहित करता है ताकि वे समाज के बौद्धिक संवर्धन के लिए और अधिक लिखें, जिससे अंततः जनता को लाभ पहुँचता है। कॉपी-पेस्ट संस्कृति पर लगाम:- ​आज सूचना क्रांति और इंटरनेट के दौर में किसी भी साहित्यिक सामग्री को उठाकर अपने नाम से इस्तेमाल कर लेना (साहित्यिक चोरी) बहुत आसान हो गया है। ऐसे समय में कॉपीराइट कानून एक बौद्धिक संपदा कानून के रूप में ढाल का काम करता है। यह लेखक की अनुमति के बिना रचना की नकल, बिक्री या उसके दुरुपयोग को रोकता है, जिससे रचनाकार का आर्थिक और मानसिक हित सुरक्षित रहता है। निष्कर्ष और संकल्प:- यह बहुत ही दुखद है कि आज कोई भी व्यक्ति किसी के काम को बिना अनुमति के तोड़-मरोड़कर प्रस्तुत करता है या उपयोग करता है, जो कि कॉपीराइट का सीधा उल्लंघन है। हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि हम अपने जीवन में अधिक किताबें पढ़ें और पुस्तकों का दान करें। पढ़ने से ज्ञान में बढ़ोत्तरी होती है, शब्दावली का विकास होता है और अवसाद कम होता है। हमें याद रखना चाहिए कि किताबें दुनिया चलातीं हैं और किताबें एक अनोखा पोर्टेबल जादू हैं। लेखन और पठन हमारी आत्मा को पोषण देते हैं। इसलिए बौद्धिक संपदा की रक्षा बहुत ही महत्वपूर्ण और अहम् है।कॉपीराइट दिवस हमें सिखाता है कि सृजन और प्रतिभा का सम्मान होना चाहिए।यह दिवस रचनाकारों के अधिकारों की रक्षा का संदेश देता है।हमें मौलिकता को अपनाकर नकल की प्रवृत्ति से दूर रहना चाहिए तथा रचनात्मक समाज के निर्माण में कॉपीराइट का पालन अत्यंत आवश्यक है।

 

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