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कम पानी वाली जमीन में उगाया खजूर बाग, चमक गई किसान की किस्मत; खजूर की खेती बनी लाखों की कमाई का नया मॉडल

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HQ Report

जालना। बदलते मौसम, बढ़ती लागत और पारंपरिक खेती में घटते मुनाफे के बीच महाराष्ट्र के जालना जिले के एक किसान ने नवाचार और दूरदर्शिता का ऐसा उदाहरण प्रस्तुत किया है, जो देशभर के किसानों के लिए प्रेरणा बन गया है। घनसावंगी तहसील के तनवाडी गांव के किसान दामोदर शेंडगे ने कम पानी और सूखी जमीन में खजूर की बागवानी कर न केवल अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत की है, बल्कि यह भी साबित कर दिया है कि आधुनिक सोच और वैज्ञानिक खेती अपनाकर खेती को लाभ का बड़ा माध्यम बनाया जा सकता है।

जहां अधिकांश किसान पानी की कमी के कारण फसल उत्पादन में आने वाली कठिनाइयों से जूझ रहे हैं, वहीं दामोदर शेंडगे ने अपनी तीन एकड़ भूमि पर खजूर के पौधे लगाकर सफलता की नई कहानी लिखी है। वर्ष 2019 में शुरू की गई यह पहल आज लाखों रुपये की आय का स्रोत बन चुकी है। खजूर की खेती से इस वर्ष लगभग 20 लाख रुपये तक की आय होने की संभावना जताई जा रही है, जिससे क्षेत्र के किसानों में भी इस खेती के प्रति उत्साह बढ़ा है।

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दामोदर शेंडगे बताते हैं कि उन्होंने खेती में कुछ नया करने का निर्णय लिया था। पारंपरिक फसलों में लागत अधिक और लाभ अपेक्षाकृत कम मिलने के कारण उन्होंने वैकल्पिक खेती के विकल्पों पर अध्ययन किया। इसी दौरान उन्हें गुजरात में खजूर की व्यावसायिक खेती की जानकारी मिली। वहां के सफल किसानों से मुलाकात करने और खेती की तकनीकों को समझने के बाद उन्होंने अपने खेत में खजूर का बाग लगाने का निर्णय लिया।

उन्होंने गुजरात से उच्च गुणवत्ता वाले खजूर के पौधे मंगवाए। प्रत्येक पौधे की कीमत लगभग चार हजार रुपये थी। शुरुआत में यह निवेश काफी बड़ा प्रतीत हुआ, लेकिन भविष्य की संभावनाओं को देखते हुए उन्होंने जोखिम उठाने का फैसला किया। खेत में आधुनिक तकनीक के अनुसार पौधारोपण किया गया और ड्रिप सिंचाई प्रणाली स्थापित की गई, जिससे पानी की बचत के साथ पौधों को आवश्यक नमी मिलती रही।

खजूर का पौधा ऐसे क्षेत्रों के लिए उपयुक्त माना जाता है जहां पानी की उपलब्धता सीमित हो। यह फसल अत्यधिक गर्मी और शुष्क वातावरण को सहन करने की क्षमता रखती है। यही कारण है कि कम वर्षा वाले क्षेत्रों में भी इसका सफल उत्पादन संभव है। दामोदर शेंडगे ने इसी विशेषता को ध्यान में रखते हुए खजूर की खेती को अपनाया और आज इसका सकारात्मक परिणाम सामने आ रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के दौर में ऐसी फसलें किसानों के लिए बेहतर विकल्प साबित हो सकती हैं, जिन्हें कम पानी की आवश्यकता होती है। खजूर उनमें से एक महत्वपूर्ण फसल है। इसकी बाजार में मांग लगातार बनी रहती है और गुणवत्तापूर्ण उत्पादन होने पर किसानों को अच्छा मूल्य प्राप्त होता है।

दामोदर शेंडगे के खेत में लगाए गए पौधों ने कुछ वर्षों के भीतर फल देना शुरू कर दिया। शुरुआती वर्षों में उत्पादन सीमित रहा, लेकिन जैसे-जैसे पौधे परिपक्व होते गए, उत्पादन में तेजी से वृद्धि होने लगी। वर्तमान में उनके बाग में तैयार होने वाले खजूर की बाजार में अच्छी मांग है और व्यापारी सीधे खेत पर पहुंचकर खरीदारी कर रहे हैं।

खजूर की खेती की एक बड़ी विशेषता यह भी है कि एक बार पौधे विकसित हो जाने के बाद लंबे समय तक उत्पादन देते रहते हैं। इससे किसानों को हर वर्ष नए सिरे से बुवाई और अन्य खर्चों का सामना नहीं करना पड़ता। नियमित देखभाल और पोषण प्रबंधन के माध्यम से कई वर्षों तक अच्छी आय प्राप्त की जा सकती है।

दामोदर शेंडगे ने अपने खेत में वैज्ञानिक पद्धति अपनाई है। पौधों की वृद्धि, पोषण और रोग नियंत्रण के लिए विशेषज्ञों की सलाह ली जाती है। आधुनिक कृषि तकनीकों के उपयोग से उत्पादन की गुणवत्ता भी बेहतर हुई है। यही कारण है कि उनके खेत का खजूर बाजार में विशेष पहचान बना रहा है।

खजूर की खेती के लिए भूमि चयन भी महत्वपूर्ण माना जाता है। जल निकासी वाली भूमि और पर्याप्त धूप इस फसल के लिए अनुकूल रहती है। महाराष्ट्र के कई शुष्क क्षेत्रों में ऐसी परिस्थितियां उपलब्ध हैं, जिससे इस फसल की संभावनाएं बढ़ जाती हैं। कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसानों को उचित मार्गदर्शन और तकनीकी सहायता मिले तो वे भी इस प्रकार की बागवानी से बेहतर आय अर्जित कर सकते हैं।

दामोदर शेंडगे की सफलता के बाद आसपास के क्षेत्रों के किसान भी उनके खेत का दौरा कर रहे हैं। कई किसान इस खेती की तकनीक को समझने और अपने खेतों में अपनाने के लिए जानकारी जुटा रहे हैं। इससे क्षेत्र में कृषि विविधीकरण को बढ़ावा मिल रहा है।

खजूर की खेती केवल आर्थिक दृष्टि से ही लाभदायक नहीं है, बल्कि यह जल संरक्षण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। पारंपरिक फसलों की तुलना में इसमें पानी की खपत कम होती है। ऐसे समय में जब कई क्षेत्रों में भूजल स्तर लगातार घट रहा है, कम पानी वाली फसलों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है।

कृषि क्षेत्र में नवाचार को बढ़ावा देने के लिए सरकारें भी समय-समय पर विभिन्न योजनाएं संचालित कर रही हैं। बागवानी फसलों को प्रोत्साहित करने, ड्रिप सिंचाई को बढ़ावा देने और आधुनिक तकनीकों के उपयोग के लिए किसानों को सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। ऐसे प्रयास किसानों को नई संभावनाओं की ओर प्रेरित कर रहे हैं।

दामोदर शेंडगे का मानना है कि खेती में सफलता पाने के लिए धैर्य और दीर्घकालिक दृष्टिकोण आवश्यक है। उन्होंने बताया कि खजूर की खेती में शुरुआती वर्षों में प्रतीक्षा करनी पड़ती है, लेकिन जब पौधे उत्पादन देना शुरू करते हैं तो आय की संभावनाएं काफी बढ़ जाती हैं। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे बाजार की मांग और स्थानीय परिस्थितियों का अध्ययन कर नई फसलों को अपनाने पर विचार करें।

आज उनका खेत केवल उत्पादन का केंद्र नहीं बल्कि सीखने का भी केंद्र बन गया है। कृषि विश्वविद्यालयों के छात्र, कृषि अधिकारी और किसान उनके खेत का निरीक्षण करने पहुंच रहे हैं। इससे अन्य किसानों को भी नई तकनीकों और संभावनाओं के बारे में जानकारी मिल रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में खजूर की मांग लगातार बढ़ रही है। धार्मिक आयोजनों, स्वास्थ्य उत्पादों और खाद्य उद्योग में इसका व्यापक उपयोग होता है। घरेलू उत्पादन बढ़ने से आयात पर निर्भरता कम हो सकती है और किसानों को भी बेहतर अवसर प्राप्त हो सकते हैं।

दामोदर शेंडगे की कहानी यह दर्शाती है कि यदि किसान पारंपरिक सोच से आगे बढ़कर नई तकनीकों और बाजार आधारित खेती को अपनाएं तो सीमित संसाधनों में भी बड़ी सफलता हासिल की जा सकती है। कम पानी वाली जमीन में खजूर की खेती कर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि खेती केवल जीविका का साधन नहीं, बल्कि उद्यमिता और नवाचार का भी सशक्त माध्यम बन सकती है।

आज जब देश के किसान बदलती परिस्थितियों के अनुरूप नई राह तलाश रहे हैं, तब जालना के इस किसान का खजूर बाग सफलता, आत्मनिर्भरता और कृषि नवाचार का प्रेरणादायी उदाहरण बनकर सामने आया है। उनकी उपलब्धि यह संदेश देती है कि सही योजना, वैज्ञानिक सोच और निरंतर प्रयास से खेती को लाभकारी व्यवसाय में बदला जा सकता है तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी जा सकती है।

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