
शांति, सद्भाव और मानवता का संदेश देती होली की काव्य प्रस्तुति
फागुन मास के पावन अवसर पर रंगों के पर्व होली को समर्पित यह भावपूर्ण काव्य रचना समाज में शांति, भाईचारे और वैश्विक सौहार्द का संदेश देती है। वर्तमान समय में जब विश्व युद्ध, हिंसा और अशांति की चुनौतियों से जूझ रहा है, तब यह कविता मानवता को प्रेम और सद्भाव के रंगों में रंगने का आह्वान करती है।
काव्य रचना
ग्रहण होलिका पर लगा, क्या कहते नक्षत्र।
अपशगुनों से मुक्त हो, सुख व्यापे सर्वत्र।।
युद्ध भरे आकाश में, धरती लहूलुहान।
बच्चों पर बमबारियां, बूढ़े सब हैरान।।
इस होली पर हों दहन, गोले, असला, तोप।
रंग खेलने संग हों, पंडित, मुल्ला, पोप।।
होली अमृत तुल्य है, इसमें बसी मिठास।
सदा बांटती ही रही, अपनी मलय सुवास।।
रोज़े रंगों में रचें, रंग करें इफ्तार।
एक–दूसरे का करें, मिल आदर–सत्कार।।
ऐसे रंग न फैंकिए, जो कर दें बदरंग।
उत्सव के उल्लास में, जलने लगें न अंग।।
बैठी जहां उदासियां, पसरा है अवसाद।
होली पर जा दीजिए, अपनापन विश्वास।।
गांव शहर कस्बे सभी, सारे घर–परिवार।
रंगारंग मनाइए, होली का त्यौहार।।
है इतनी शुभकामना, बनी रहे मुस्कान।
दुनिया का सिरमौर हो, अपना हिंदुस्तान।।
होली का संदेश
यह रचना केवल उत्सव की शुभकामना नहीं, बल्कि सामाजिक समरसता, धार्मिक सद्भाव और वैश्विक शांति की प्रेरणा देती है। कविता में यह संदेश स्पष्ट है कि होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि मनुष्यता को जोड़ने वाला सांस्कृतिक उत्सव है।
होली की मंगलकामनाएं
चौ. मदन मोहन समर
श्रीमती सरिता समर









